नई दिल्ली।भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की हालिया टिप्पणी—“हम जातिविहीन समाज चाहते हैं, क्या आप देश को भूतकाल में ले जाना चाहते हैं”—को लेकर सवर्ण समाज में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि जाति व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी एक ही वर्ग, विशेषकर ब्राह्मण समाज पर डालना न सिर्फ ऐतिहासिक रूप से अधूरा सच है, बल्कि समाज में नई वैचारिक खाई भी पैदा करता है।
सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का तर्क है कि यदि जाति व्यवस्था केवल ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई होती, तो फिर मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन समुदायों में प्रचलित जातिगत विभाजन की व्याख्या कैसे की जाए। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि जब जातिविहीन समाज की बात की जाती है, तो नाम के साथ जाति जोड़ने की मजबूरी किसने पैदा की और आज कौन इसे बनाए रखे हुए है।
OBC, ST, SC समाज का कहना है कि देश में सामान्य वर्ग के लोग IAS, IPS, CJI, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों तक पहुंचने के बावजूद यदि स्वयं को शोषित महसूस कर रहे हैं, तो इसके पीछे किसी एक समाज को दोषी ठहराना उचित नहीं, बल्कि समग्र सामाजिक सोच और नीतियों की समीक्षा जरूरी है।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल भारतीय जनता पार्टी को लेकर खड़ा हो रहा है। सवर्ण समाज के लोगों का कहना है कि दुख इस बात का है कि सामान्य वर्ग के साथ ऐसा व्यवहार उसी बीजेपी सरकार के दौर में हुआ, जिसे उसके सबसे कठिन समय में भी सवर्ण समाज ने मजबूती से समर्थन दिया था। अब वही वर्ग स्वयं को उपेक्षित और अनसुना महसूस कर रहा है।
यह बहस अब सिर्फ न्यायिक टिप्पणी तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक संतुलन, राजनीतिक भरोसे और ‘जातिविहीन समाज’ की व्यावहारिक परिभाषा पर एक बड़ी राष्ट्रीय चर्चा का रूप ले चुकी है।



