रायपुर।पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स एवं लेजर टेक्नोलॉजी विभाग में सहायक प्राध्यापक पद पर हुई भर्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि एक अपात्र अभ्यर्थी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से पूरी चयन प्रक्रिया को पूर्व-नियोजित तरीके से संचालित किया गया।
इस भर्ती प्रक्रिया में विभागाध्यक्ष डॉ. कविता ठाकुर पर अपने ही शोध छात्र डॉ. प्रफुल्ल कुमार व्यास को नियुक्त कराने के लिए नियमों को ताक पर रखने का आरोप लगाया गया है। मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय की भर्ती प्रणाली की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
विश्वविद्यालय द्वारा इनोवेटिव प्रोग्राम एम.टेक. (ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स एंड लेजर टेक्नोलॉजी) में सहायक प्राध्यापक के एक पद हेतु विज्ञापन क्रमांक 3916/स्था./सा.प्र./2023 (दिनांक 06.09.2023) जारी किया गया था। इसके बाद संशोधित विज्ञापन 2895/स्था./सा.प्र./2024 (दिनांक 03.10.2024) प्रकाशित हुआ।
इस पद के लिए 30 जनवरी 2026 को साक्षात्कार आयोजित किया गया।
मुख्य आरोप
1. अपात्र अभ्यर्थी का चयन:
आरोप है कि डॉ. प्रफुल्ल कुमार व्यास के पास केवल एम.एससी. की डिग्री है, जबकि एआईसीटीई मानकों के अनुसार एम.टेक. कार्यक्रम में अध्यापन के लिए एम.टेक./एम.ई. अनिवार्य है। उनकी शैक्षणिक योग्यता न तो पद की आवश्यकताओं से मेल खाती है और न ही विषय से संबंधित बताई जा रही है।
2. हितों का स्पष्ट टकराव:
डॉ. प्रफुल्ल व्यास, विभागाध्यक्ष डॉ. कविता ठाकुर के शोध छात्र एवं पीएच.डी. स्कॉलर हैं। विभागाध्यक्ष का चयन प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभाना, निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
3. 18 लाख रुपये के संदिग्ध लेनदेन:
सूत्रों के अनुसार, डॉ. व्यास को दिशा एजुकेशन सोसायटी से लगभग 18 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। बताया जा रहा है कि वे सोसायटी के एक कॉलेज में सहायक प्राध्यापक के पद पर नामित हैं, लेकिन वास्तविक शैक्षणिक कार्य के बजाय प्रशासनिक दायित्व निभाते हैं।
4. चयन समिति पर भी सवाल:
चयन समिति में विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. संजीव टोकेकर (प्रोफेसर, आईईटी-डीएवीवी, इंदौर) को शामिल किया गया। आरोप है कि वे पूर्व में इसी विश्वविद्यालय की शोध उपाधि समिति से जुड़े रहे हैं, जिस दौरान डॉ. प्रफुल्ल व्यास का पीएच.डी. पंजीकरण हुआ था।
छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 49(2) के तहत विशेषज्ञ का विश्वविद्यालय से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं होना चाहिए।
5. विषय विशेषज्ञता पर भी आपत्ति:
डॉ. टोकेकर की विशेषज्ञता कंप्यूटर नेटवर्किंग और कंप्यूटर आर्किटेक्चर में बताई जा रही है, जबकि संबंधित पद ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स एवं लेजर टेक्नोलॉजी से जुड़ा है, जो तकनीकी रूप से एक अलग क्षेत्र है।
तीन नाम, एक विवाद
- डॉ. कविता ठाकुर – विभागाध्यक्ष
- डॉ. संजीव टोकेकर – चयन समिति विशेषज्ञ
- डॉ. प्रफुल्ल कुमार व्यास – अभ्यर्थी
कथित रूप से उल्लंघित नियम
- छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 (धारा 49(2))
- एआईसीटीई अप्रूवल प्रोसेस हैंडबुक
- यूजीसी विनियम, 2018
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21
पात्र अभ्यर्थियों में नाराजगी
सूत्रों के अनुसार कुल 35 अभ्यर्थियों को पात्र घोषित किया गया, जिनमें कई की योग्यता भी पद की अनिवार्य शर्तों पर खरी नहीं उतरती। पात्र अभ्यर्थियों का कहना है कि जब प्रारंभिक सूची ही संदेहास्पद है, तो चयन निष्पक्ष कैसे माना जाए।
शिकायतकर्ताओं की मांग
शिकायतकर्ताओं ने राज्यपाल एवं कुलाधिपति से मांग की है कि—
- पूरी चयन प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जाए
- नई चयन समिति का गठन किया जाए
- जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो
- 18 लाख रुपये के कथित लेनदेन की सीबीआई या एसीबी से जांच कराई जाए
विश्वविद्यालय का पक्ष
मामले पर विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क किया गया, हालांकि अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। कुलसचिव कार्यालय का कहना है कि प्रकरण की जांच की जा रही है।
यह प्रकरण राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। अब सबकी निगाहें राजभवन के अगले कदम पर टिकी हैं।






