असम के मुख्यमंत्री हेमंता बिस्वा सरमा का ‘मियां’ वाला बयान अब राजनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़कर कानूनी विवाद बन चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दिल्ली में उनके खिलाफ भड़काऊ और घृणास्पद भाषण देने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई है। दिल्ली पुलिस ने शिकायत की जांच शुरू कर दी है।
27 जनवरी को दिए गए बयान में मुख्यमंत्री ने बंगाली मूल के मुसलमानों के वोट काटने और विशेष पुनरीक्षण के दौरान उनके खिलाफ आपत्तियां दर्ज कराने की बात कही थी। सवाल यह है कि क्या किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से यह संकेत देने का अधिकार है कि किसी खास समुदाय को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर किया जाए?
एफआईआर के जवाब में मुख्यमंत्री का यह कहना कि वे हर्ष मंदर के खिलाफ “कम से कम 100 केस” दर्ज कराएंगे, सत्ता के अहंकार और संवैधानिक संयम—दोनों पर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में असहमति का जवाब कानूनी प्रक्रिया से दिया जाता है, न कि धमकी से।
यह मामला सिर्फ हेमंता बनाम मंदर नहीं है। यह इस बात की कसौटी है कि क्या भारत में कानून सत्ता की भाषा को भी उसी तरह नियंत्रित करेगा, जैसे वह आम नागरिक को करता है—या फिर लोकतंत्र सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।







