रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कांग्रेस के कद्दावर आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री कवासी लखमा के समर्थन में तीखा बयान दिया। साव ने लखमा के खिलाफ हुई कानूनी कार्रवाई को ‘अन्याय’ करार देते हुए जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
‘निर्दोष’ आदिवासी कार्ड ने बढ़ाई हलचल
डिप्टी सीएम अरुण साव ने कवासी लखमा को एक “निर्दोष आदिवासी नेता” बताते हुए कहा कि उनके साथ जो कुछ भी हुआ, उसे छत्तीसगढ़ की जनता करीब से देख रही है। साव का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लखमा लंबे समय से कानूनी पेचीदगियों और जांच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं। साव ने स्पष्ट किया कि एक जनप्रिय आदिवासी चेहरे को इस तरह के हालातों में झोंकना प्रदेश के हितों के खिलाफ है।
जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल
साव के इस बयान ने राज्य में सक्रिय प्रवर्तन निदेशालय ( ED ) जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों की साख और उनकी कार्यशैली पर नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि साव ने परोक्ष रूप से यह संकेत दिया है कि:
- राजनीतिक रसूख के चलते कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग हो रहा है।
- आदिवासी नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे समाज में रोष है।
- न्याय प्रक्रिया और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक गहरा विरोधाभास है।
बदलते राजनीतिक समीकरण
जहाँ एक ओर भाजपा और कांग्रेस के बीच हमेशा ‘तलवारें खिंची’ रहती हैं, वहीं भाजपा के इतने बड़े नेता द्वारा कांग्रेस नेता का बचाव करना राज्य की सियासत में नए समीकरणों की ओर इशारा कर रहा है।







