जगदलपुर।छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान अपने दुर्लभ वन्य जीवों, राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना, मनमोहक गुफाओं और झरनों के कारण देश-विदेश के पर्यटकों के बीच खास पहचान रखता है। लगभग 200 वर्ग किलोमीटर में फैले इस राष्ट्रीय उद्यान के आसपास बसे वन्य ग्रामों में रहने वाले आदिवासी युवाओं के लिए कभी पक्षियों और जानवरों का शिकार परंपरा और शौक का हिस्सा हुआ करता था।
वन विभाग ने इसी परंपरा को सकारात्मक दिशा देने के लिए इको-टूरिज्म मॉडल को अपनाया और आदिवासी युवाओं को रोजगार से जोड़ने की अनूठी पहल की। पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए स्थानीय युवक-युवतियों को पर्यटक गाइड और जिप्सी चालक के रूप में प्रशिक्षित किया गया। इसके लिए इको विकास समिति का गठन कर उन्हें पेट्रोल से चलने वाली जिप्सियां उपलब्ध कराई गईं।
वर्तमान में उद्यान क्षेत्र में 300 से अधिक आदिवासी युवक-युवतियां गाइड और जिप्सी ड्राइवर के रूप में कार्य कर रहे हैं, जिनकी मासिक आय 15 से 25 हजार रुपये तक पहुंच रही है। यह योजना न केवल उन्हें आजीविका दे रही है, बल्कि वन्यजीव संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा रही है।
कम प्रदूषण, ज्यादा संरक्षण
वन्य जीवों के शिकार और अवैध कटाई जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से करीब एक दशक पहले वन विभाग ने मारुति कंपनी से करार कर 35 पेट्रोल चालित जिप्सियां खरीदी थीं। डीजल के बजाय पेट्रोल वाहनों के उपयोग से वेली क्षेत्र में प्रदूषण का स्तर भी नियंत्रित रखा जा सका।
पर्यटकों को सैर, जंगल की जानकारी
इको विकास समिति के माध्यम से प्रशिक्षित गाइड और चालक कोटमसर गुफा, कैलाश गुफा, तीरथगढ़ जलप्रपात, धुड़मारास जैसे प्रमुख पर्यटन स्थलों में सैलानियों को भ्रमण कराते हैं और उन्हें जंगल, जैव विविधता व स्थानीय संस्कृति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी देते हैं।
एक पहल, दो लाभ
इस योजना से जहां आदिवासी युवाओं को स्थायी रोजगार मिला है, वहीं राष्ट्रीय उद्यान में मौजूद दुर्लभ वन्य जीवों और जैव विविधता का संरक्षण भी सशक्त हुआ है।
कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के संचालक नवीन कुमार ने बताया कि स्थानीय युवाओं को गाइड प्रशिक्षण और जिप्सी उपलब्ध कराकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया गया है। इको विकास समिति द्वारा योजना का बेहतर संचालन हो रहा है, जिससे वन्यजीव संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय सफलता मिली है।



