बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने 143 सीटों पर उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। लेकिन इस टिकट बंटवारे ने पार्टी के सबसे बड़े नारे ‘सामाजिक न्याय’ को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आरजेडी पर अब यह आरोप लग रहा है कि उसने अपने पारंपरिक मुस्लिम–यादव (M-Y) वोट बैंक पर अत्यधिक भरोसा किया है, जबकि अन्य वर्गों को हाशिए पर छोड़ दिया गया है।
मुस्लिम-यादव समीकरण पर जोर:
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, RJD की घोषित सूची में करीब 50 यादव और 18 मुस्लिम प्रत्याशी शामिल हैं। यानी कुल उम्मीदवारों में से लगभग आधे केवल इन दो समुदायों से हैं। इसे पार्टी की “कोर वोट बैंक स्ट्रैटेजी” के तौर पर देखा जा रहा है।
‘जिसकी जितनी संख्या भारी’ का क्या हुआ?
लालू प्रसाद यादव के नारे “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” को हमेशा पार्टी की विचारधारा का केंद्र माना गया है। लेकिन टिकट बंटवारे के आंकड़े बताते हैं कि अति पिछड़े वर्ग (EBC), दलित, महादलित और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) की भागीदारी बहुत सीमित है। इससे पार्टी के दावों पर सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब ‘सामाजिक न्याय’ केवल भाषणों तक सीमित रह गया है?
विपक्ष का हमला:
विपक्षी दलों ने RJD पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने ‘सामाजिक न्याय’ को छोड़कर ‘सामाजिक समीकरण’ की राजनीति अपना ली है। विपक्ष का आरोप है कि आरजेडी केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने में लगी है और अन्य वर्गों की अनदेखी कर रही है।
RJD समर्थकों का तर्क:
RJD समर्थक पार्टी के इस निर्णय का बचाव करते हुए कहते हैं कि यादव और मुस्लिम समुदाय ही पार्टी की राजनीतिक रीढ़ हैं। इसलिए चुनावी गणित को देखते हुए इन वर्गों को वरीयता देना रणनीतिक दृष्टि से स्वाभाविक कदम है।
बड़ा सवाल:
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या RJD का ‘सामाजिक न्याय’ का वादा अब केवल राजनीतिक भाषणों का हिस्सा बन गया है, या पार्टी ने सच में अपनी विचारधारा को सीमित कर दिया है? इस टिकट बंटवारे का असर बिहार की सामाजिक और राजनीतिक दिशा दोनों पर पड़ना तय है।







