नागेंद्र पाण्डेय, संपादक
छत्तीसगढ़ की राजनीति के केंद्र कोरबा जिले में इस समय सत्ता के गलियारों में जबरदस्त हलचल है। पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकी राम कंवर ने अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, उसने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। यह केवल किसी प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ विरोध नहीं, बल्कि जन-सरोकार, आदिवासी अस्मिता और सत्ता की जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बन चुका है।
ननकी राम कंवर का आंदोलन सरकारी योजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, फर्जी मुआवजा वितरण और आदिवासी क्षेत्रों की उपेक्षा जैसे गंभीर आरोपों पर केंद्रित है। उन्होंने कोरबा कलेक्टर अजीत वसंत को हटाने की मांग की है, जिन पर उन्होंने हिटलरशाही रवैया अपनाने, मुआवजा दिए बिना घर तोड़ने और पद के दुरुपयोग के आरोप लगाए हैं। 4 अक्टूबर 2025 को कंवर ने मुख्यमंत्री आवास के सामने धरना देने की चेतावनी दी थी। तनाव बढ़ने पर प्रशासन ने उन्हें रायपुर में समर्थकों सहित नजरबंद कर दिया। लेकिन यह कदम सरकार के लिए उल्टा साबित हुआ। जनता में विरोध की लहर तेज हुई और सरकार को अंततः बातचीत का आश्वासन देना पड़ा, हालांकि कंवर अब भी अपने रुख पर अड़े हुए हैं।
कंवर के समर्थकों में “ननकी को नान समझो मत” नारा गूंज रहा है। यह केवल एक राजनीतिक चेतावनी नहीं बल्कि आदिवासी सम्मान और हिस्सेदारी की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। ननकी राम कंवर ने खुले शब्दों में कहा, “बिना कंपनसेशन दिए कोरबा कलेक्टर ने हजारों घर तोड़ दिए। ऐसे कलेक्टर को छोड़ना चाहिए क्या? ऐसा मुख्यमंत्री किस काम का? यही रवैया रहा तो मैं सरकार भंग कराऊंगा।” उनका यह बयान भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए गंभीर संकट का संकेत है। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि इस घटना का असर 2028 के विधानसभा चुनावों तक दिखाई देगा।
कोरबा हमेशा से छत्तीसगढ़ की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। यह जिला न केवल औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यहां की जनता की नाराज़गी या समर्थन अक्सर रायपुर की सत्ता के समीकरण बदल देता है। ननकी राम कंवर की यह खुली बगावत यह स्पष्ट संकेत देती है कि यदि जनभावनाओं की अनदेखी जारी रही तो वर्तमान सत्ता की नींव कमजोर पड़ सकती है।
यह प्रकरण केवल ननकी राम कंवर बनाम कलेक्टर नहीं, बल्कि जनता बनाम सत्ता का प्रतीक बन चुका है। सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में असहमति को दमन से नहीं, संवाद से सुलझाया जाता है। अन्यथा यह “कोरबा का आंदोलन” आने वाले समय में “छत्तीसगढ़ का जनआंदोलन” बन सकता है। यह समय है जब सत्ता को आत्ममंथन करना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि शासन जनता की सेवा के लिए है या सत्ता के संरक्षण के लिए।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का भाजपा पर हमला
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शनिवार को भाजपा पर लोकतंत्र की हत्या और प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री ननकी राम कंवर को नजरबंद करने का आरोप लगाया। बघेल ने कहा कि भाजपा सरकार विपक्षी नेताओं को दबाने के लिए तानाशाही रवैया अपना रही है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बस्तर दौरे और उनके बयानों पर भी तीखा प्रहार किया। बघेल ने कहा, “जब प्रदेश में आदिवासी नेता की आवाज़ को कैद किया जा रहा है, तब दिल्ली की चुप्पी बहुत कुछ कहती है।







