क्या विवादित वी. श्रीनिवास सरकार से ऊपर हैं? सत्ता बदली , सिस्टम नहीं

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में सत्ता परिवर्तन को लगभग दो साल हो चुके हैं। जनता ने धर्मांतरण, घुसपैठ और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया। उम्मीद थी कि नई सरकार इन ज्वलंत मुद्दों पर ठोस कार्रवाई करेगी और प्रशासनिक तंत्र में बदलाव लाएगी।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद कुछ विवादित और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अधिकारी आज भी उच्च पदों पर जमे हुए हैं।

 मोहम्मद अकबर के करीबी रहे वी. श्रीनिवास अब भी पीसीसीएफ पद पर

इनमें सबसे चर्चित नाम है वी. श्रीनिवास का — जो भूपेश बघेल सरकार में वन मंत्री मोहम्मद अकबर के बेहद करीबी माने जाते थे।

जुलाई 2023 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले श्रीनिवास को पीसीसीएफ (प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख) जैसे अहम पद पर पदोन्नत किया गया। इससे पहले वे लगभग चार वर्षों तक कैंपा फंड के प्रभारी रहे — वह फंड जो पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए, वृक्षारोपण और संरक्षण कार्यों में खर्च किया जाना चाहिए।

 कैंपा फंड का दुरुपयोग: मस्जिद निर्माण तक पहुंचा पैसा

आरोप हैं कि श्रीनिवास के कार्यकाल में कैंपा फंड का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ।

जानकारी के अनुसार, बिलासपुर की लूथरा शरीफ मस्जिद के बाहर गार्डन निर्माण और पेंड्रा मरवाही क्षेत्र में मस्जिद निर्माण जैसे कार्यों में भी कैंपा के पैसे खर्च किए गए।

यह मामला उस समय विधानसभा में उठा था, परंतु तत्कालीन सत्ता के शोर में दबा दिया गया।

 नई सरकार की चुप्पी: क्या श्रीनिवास सरकार से ऊपर हैं?

अब जबकि राज्य में बीजेपी की विष्णुदेव साय सरकार बन चुकी है, तब भी वी. श्रीनिवास अपने पद पर कायम हैं।

सूत्रों के अनुसार, वन मंत्री केदार कश्यप ने स्वयं मुख्यमंत्री को श्रीनिवास को हटाने की अनुशंसा की थी, जिसे मुख्यमंत्री द्वारा अनुमोदित भी कर दिया गया था।

फिर भी, दो वर्ष बीत जाने के बावजूद श्रीनिवास आज भी उसी पद पर बने हुए हैं।

यह स्थिति न केवल प्रशासनिक अनुशासन पर प्रश्न उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कुछ अधिकारी आज भी राजनीतिक परिवर्तन से अप्रभावित हैं — मानो वे “सरकार से ऊपर” हों।

 जनता का सवाल: क्या बदलाव सिर्फ चेहरों का हुआ?

जनता के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि अगर विवादित और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाया जाता रहा, तो फिर सत्ता परिवर्तन का असली अर्थ क्या रह गया?

क्या यह वही सिस्टम है, जिसमें सत्ता बदलती है लेकिन सत्ता की कार्यशैली नहीं?

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