देश भर में हिंदू समाज और धार्मिक संगठनों के बीच यह मांग तेजी से उठ रही है कि हिंदू मंदिरों को सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्त किया जाए। यह केवल आस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक, आर्थिक और संवैधानिक विमर्श बनता जा रहा है।
कौन करता है मंदिरों का संचालन?
भारत के कई राज्यों में लाखों मंदिरों का प्रशासन राज्य सरकारें संभाल रही हैं। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों – तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, और केरल – में मंदिरों का प्रबंधन “हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग” (HR&CE) के अधीन होता है।
इसके विपरीत, मस्जिदें और चर्च अपने-अपने समुदायों द्वारा स्वतंत्र रूप से संचालित होते हैं — उन पर किसी सरकारी विभाग का नियंत्रण नहीं होता।
मंदिरों की आय कहाँ जाती है?
हर साल करोड़ों भक्त मंदिरों में श्रद्धा से दान करते हैं, इस भावना के साथ कि यह राशि धार्मिक कार्यों, समाज सेवा, संस्कृत शिक्षा, वेद पाठशालाओं और मंदिरों की मरम्मत में लगे।
लेकिन सरकार द्वारा नियंत्रित मंदिरों में यह पैसा अक्सर प्रशासनिक खर्चों, राजनीति-प्रेरित योजनाओं या गैर-धार्मिक उपयोगों में खर्च कर दिया जाता है। इससे न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, बल्कि दानदाताओं की भावनाओं को भी ठेस पहुँचती है।
क्या कहता है संविधान?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। धर्मनिरपेक्षता का सार यह है कि सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार हो, न कि किसी एक को नियंत्रित कर बाकी को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए।
विधि विशेषज्ञों का मत है कि केवल हिंदू धार्मिक संस्थाओं को ही सरकारी नियंत्रण में रखना धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण
धार्मिक और सांस्कृतिक विचारकों का कहना है कि प्राचीन भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे — वे गुरुकुल, संगीत-नृत्य कला केंद्र और समाज सुधार के केंद्र भी थे।
लेकिन सरकारी नियंत्रण में इन मंदिरों की मूल भूमिका कमजोर होती जा रही है। परंपराएं समाप्त हो रही हैं, और मंदिर अपनी सामाजिक उपयोगिता खोते जा रहे हैं।
RTI और NSSO के आँकड़ों से खुलासा
- NSSO के आंकड़ों के अनुसार:
- देश में 80% हिंदू आबादी के लिए लगभग 5 लाख मंदिर हैं।
- वहीं, 19% मुस्लिम जनसंख्या के लिए 7 लाख मस्जिदें।
- 3000 गुरुकुलों की तुलना में 3.5 लाख मदरसे सक्रिय हैं।
RTI के तहत एक सवाल के जवाब में सरकार ने खुद माना कि उसके पास यह जानकारी नहीं है कि मंदिरों का दान कहाँ और कैसे खर्च हो रहा है।
उठ रही हैं ये मांगें:
- मंदिरों का संचालन स्वतंत्र ट्रस्टों के हाथ में दिया जाए।
- मंदिरों की आय केवल धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सेवा में ही खर्च हो।
- मंदिरों को शिक्षा, सेवा और संस्कृति संरक्षण की उनकी पारंपरिक भूमिका में पुनर्स्थापित किया जाए।
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की माँग आज केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय, और सांस्कृतिक पुनरुद्धार का महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुकी है।
इस विषय पर राष्ट्रव्यापी संवाद, न्यायिक समीक्षा और नीति-निर्माण की आवश्यकता है।







