चैतन्य बघेल के लिए नाकेबंदी, लेकिन जेल में बंद कवासी लखमा के लिए सन्नाटा क्यों?

Madhya Bharat Desk
3 Min Read

छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों तीखी हलचलों से गुजर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल की ईडी द्वारा गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस ने आज प्रदेशव्यापी आर्थिक नाकेबंदी कर केंद्र सरकार और राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। दोपहर 12 से 2 बजे तक पूरे प्रदेश में व्यापार ठप रहा, सड़कों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ नजर आई, और नारों से माहौल गूंज उठा।

लेकिन इस विरोध के बीच एक गंभीर सवाल भी उठ खड़ा हुआ है — क्या कांग्रेस के भीतर भी ‘राजनीतिक प्राथमिकताओं’ का भेदभाव है?

क्योंकि जब चैतन्य बघेल को गिरफ्तार किया गया तो पार्टी ने युद्धस्तर पर मोर्चा खोल दिया, लेकिन छत्तीसगढ़ के पूर्व कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ आदिवासी नेता कवासी लखमा, जो इस वक्त जेल में बंद हैं, उनके लिए पार्टी का रवैया पूरी तरह मौन और निष्क्रिय दिखाई दिया।

आदिवासी नेता के लिए चुप्पी क्यों?

कवासी लखमा, जो बस्तर क्षेत्र के प्रभावशाली नेता और आदिवासी समुदाय की एक मजबूत आवाज रहे हैं, उन पर भी आर्थिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। उन्हें पिछले सप्ताह गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया और वे इस वक्त जेल में बंद हैं। लेकिन उनके समर्थन में न कोई धरना, न कोई रैली और न ही कोई सत्ताधारी दल की आलोचना — कांग्रेस का नेतृत्व इस मुद्दे पर पूरी तरह खामोश है।

  • क्या कांग्रेस सिर्फ राजनीतिक परिवारों से आने वाले नेताओं के लिए लड़ती है, जबकि आदिवासी नेतृत्व को अकेला छोड़ देती है?
  • क्या यह चुप्पी आदिवासी समाज के लिए राजनीतिक अपमान नहीं है?
  • क्या यह कांग्रेस की आंतरिक जातिगत-सामाजिक असमानता को उजागर नहीं करता?

राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति कांग्रेस के लिए गंभीर साख का संकट पैदा कर सकती है। अगर पार्टी आदिवासी नेताओं के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाती, तो इससे उसका सामाजिक न्याय और समावेशिता का दावा खोखला साबित हो सकता है।

आज कांग्रेस ने भूपेश बघेल के बेटे के लिए प्रदेश ठप कर दिया, लेकिन जेल में बंद कवासी लखमा के लिए न तो कोई नारा गूंजा, न कोई मोर्चा खुला। यह अंतर अब जनता और आदिवासी समाज के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment