छत्तीसगढ़ का दर्दनाक सच: जब आदिवासी नेता ही आदिवासियों के जंगल बेच दे
हसदेव अरण्य का मामला केवल पर्यावरण या कोल खनन का नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की आत्मा का सवाल है। जब एक आदिवासी मुख्यमंत्री के कार्यकाल में 21 हजार एकड़ समृद्ध जैव विविधता वाला वन क्षेत्र अडानी जैसी कॉर्पोरेट कंपनी को सौंप दिया जाए, तो यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि क्या विकास के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन और उनका अस्तित्व मिटाना स्वीकार्य है?
आदिवासी मुख्यमंत्री की विडंबना
छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री का होना गर्व की बात है। लेकिन जब वही मुख्यमंत्री आदिवासियों की जमीन, जंगल और जल स्रोतों को कॉर्पोरेट हितों के हवाले कर दे, तो यह विडंबना नहीं तो और क्या है? स्थानीय आदिवासी समुदायों का सीधा आरोप है कि “आदिवासी मुख्यमंत्री द्वारा ही आदिवासियों के संपत्ति को उजाड़ा जा रहा है।”
यह सवाल हर आदिवासी के मन में उठ रहा है कि क्या उनका प्रतिनिधित्व करने वाला नेता ही उनके खिलाफ साजिश कर रहा है? आदिवासी समुदाय, विशेषकर गोंड जनजाति, सैकड़ों वर्षों से जंगलों पर निर्भर हैं। उनका जीवन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान जंगल से जुड़ी है।
अडानी और हसदेव: कॉर्पोरेट हित बनाम जनहित
हसदेव अरण्य क्षेत्र में चार सबसे बड़े कोल ब्लॉक अडानी समूह को सौंपे गए हैं। तारा कोल ब्लॉक अकेले 5,000 एकड़ क्षेत्र में फैला है, जिसमें 4,000 एकड़ से अधिक घना जंगल शामिल है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार, खनन शुरू होने पर 10 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई का खतरा है। वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया की जैव विविधता रिपोर्ट में इस क्षेत्र को आगे खनन के लिए ‘no-go’ घोषित करने की सिफारिश की गई है।
सवाल यह है कि क्या अडानी के मुनाफे के लिए छत्तीसगढ़ की जैव विविधता और आदिवासियों का भविष्य दांव पर लगाया जा सकता है?
मिनीमाता बांगो: पानी का संकट
मिनीमाता बांगो बांध, जो हसदेव नदी पर बना है, कोरबा और आसपास के शहरों को पानी आपूर्ति करता है। वनों की कटाई से जलस्रोतों का सूखना और बाढ़-सूखे का चक्र बिगड़ने का खतरा बढ़ता है।
अगस्त 2026 में भारी बारिश के बाद बांगो बांध का जलस्तर 94% तक पहुंच गया था और 9 गेट खोलकर पानी छोड़ा गया था। अगर जंगल कटेंगे, तो भविष्य में यह बांध सूख सकता है और लाखों लोग पानी के लिए तरस जाएंगे।
“हसदेव का विनाश छत्तीसगढ़ का विनाश है”
स्थानीय आदिवासी नेताओं ने कहा, “हसदेव का विनाश छत्तीसगढ़ का विनाश है और इस विनाश को भाजपा एक आदिवासी मुख्यमंत्री के हाथों से करवा रही है।”
यह बयान केवल राजनीतिक नारा नहीं है। यह सच्चाई है। हसदेव अरण्य मध्यभारत परिदृश्य के सबसे बड़े अखंडित वन ब्लॉकों में से एक है और यह छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के जंगलों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण हाथी गलियारा भी है।
2012 से 2023 के बीच सरकारी आंकड़ों के अनुसार 81,000 से अधिक पेड़ कटे हैं, जबकि पर्यावरण कार्यकर्ताओं का दावा है कि यह संख्या 3.5 लाख से अधिक है।
PESA Act का उल्लंघन: कानून की धज्जियां
राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन में हसदेव के मामले को “नौकरशाही का आदिवासियों के खिलाफ युद्ध” बताया गया।
नेताओं ने आरोप लगाया, “छत्तीसगढ़ के हसदेव वन मामले और वहां चार लाख पेड़ों की कटाई दिखाती है कि PESA Act का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन अडानी के फायदे के लिए किया गया, ग्राम सभा संख्या में हेरफेर किया गया।”
PESA Act आदिवासियों को अपने संसाधनों पर अधिकार देता है। लेकिन जब ग्राम सभा की सहमति को दरकिनार करके बड़े पैमाने पर वन कटाई की जाए, तो यह लोकतंत्र की हत्या है।
सरकारी पक्ष: विकास या विनाश?
सरकारी पक्ष का कहना है कि कोल खनन से ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, और पर्यावरणीय क्षतिपूरण के उपाय किए जा रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन स्वीकार्य है? क्या ऊर्जा सुरक्षा के नाम पर जैव विविधता का विनाश जायज है? क्या क्षतिपूरण से कटे हुए 10 लाख पेड़ वापस आ जाएंगे?
जब आदिवासी मुख्यमंत्री ही आदिवासियों के खिलाफ साजिश करे, तो यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है।
सरकार को चाहिए कि वह तारा कोल ब्लॉक नीलामी रद्द करे और हसदेव अरण्य को संरक्षित घोषित करे। आदिवासियों की आवाज़ सुनी जाए। जंगल, जल और जमीन पर उनका हक बरकरार रहे।
क्योंकि “हसदेव का विनाश छत्तीसगढ़ का विनाश है।”





