मध्यप्रदेश में रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (MSME) पर संकट गहराता जा रहा है। बीते तीन वर्षों में प्रदेश में 5,374 MSME इकाइयां बंद हुई हैं। इन उद्योगों के बंद होने से 42 हजार से अधिक लोगों के रोजगार पर असर पड़ा है। चिंता की बात यह है कि बंद होने वाली इकाइयों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वर्ष 2025-26 में ही 2,861 MSME बंद हुए।
देशभर के आंकड़ों की तुलना करें तो मध्यप्रदेश की स्थिति और गंभीर नजर आती है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में देश में कुल 62,747 MSME बंद हुए। इनमें मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी करीब 4.5 प्रतिशत रही।
कर्ज, कम मांग और बढ़ती लागत बनी बड़ी चुनौती
MSME के सामने सबसे बड़ी समस्याओं में कर्ज का बढ़ता दबाव, बाजार में मांग की कमी और उत्पादन लागत में लगातार बढ़ोतरी शामिल हैं। कारोबार चलाने के लिए बड़ी मात्रा में कर्ज लेने वाली इकाइयों के सामने समय पर भुगतान और कार्यशील पूंजी की व्यवस्था करना चुनौती बनता जा रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्षों में MSME क्षेत्र को करीब 2.9 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया। इसके बावजूद बकाया राशि लगातार बढ़ती गई। वर्ष 2020-21 में करीब 35,427 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी। बढ़ते कर्ज और भुगतान के दबाव ने कई छोटी इकाइयों की आर्थिक स्थिति कमजोर कर दी।
सरकार की सब्सिडी से राहत की कोशिश
MSME क्षेत्र को संकट से बाहर निकालने के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी और अन्य योजनाओं के माध्यम से सहायता देने का प्रयास भी किया गया है। बीते तीन वर्षों में 3,857 इकाइयों को करीब 462.13 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी सब्सिडी दी गई। इसके माध्यम से करीब 1.11 लाख रोजगार पैदा करने का लक्ष्य रखा गया था।
हालांकि, उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि केवल सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं है। उद्योगों को लंबे समय तक चलाने के लिए बाजार, सस्ती वित्तीय सुविधा, समय पर भुगतान और स्थिर नीतियों की जरूरत है।





