अंबिकापुर।सरगुजा संभाग के जंगलों में हाथियों की चाल और चाल-ढाल दोनों बदल चुकी हैं। जहां कभी 70-80 हाथियों के बड़े झुंड एक साथ विचरण करते थे, वहीं अब वे 15-20 के छोटे समूहों में बंटकर चल रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ इसे सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि जंगलों के सिकुड़ने, पारंपरिक हाथी गलियारों के बाधित होने और संसाधनों की कमी का गंभीर संकेत मान रहे हैं।
वन क्षेत्रों में खनन, सड़क, खेत और बस्तियों के विस्तार ने हाथियों के पारंपरिक मार्गों को बाधित कर दिया है। कभी झारखंड और ओडिशा से भटककर आने वाले हाथी अब सरगुजा में स्थायी रूप से बस गए हैं, लेकिन लगातार घटते जंगलों के कारण उनके लिए सुरक्षित आवास भी कम पड़ने लगा है। इसका असर उनके सामाजिक व्यवहार पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
हसदेव अरण्य को लेकर पहले ही जताई गई थी चिंता
भारत सरकार के उपक्रम वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) ने पहले ही चेतावनी दी थी कि यदि हसदेव अरण्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कोयला खनन हुआ तो छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष इतना गंभीर हो सकता है कि उसे नियंत्रित करना बेहद कठिन हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि हाथी गलियारों में बढ़ते अवरोध इसी खतरे को और बढ़ा रहे हैं।
चार साल में 105 लोगों की मौत, हजारों परिवार प्रभावित
सरगुजा संभाग में वर्तमान में करीब 120 हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। पिछले चार वर्षों में हाथियों के हमलों में 105 लोगों की मौत हो चुकी है। इस दौरान 7 हजार हेक्टेयर से अधिक फसल, 3,473 मकान क्षतिग्रस्त हुए और प्रभावितों को 25 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा वितरित किया गया।
वहीं, पिछले सात वर्षों में 62 हाथियों की मौत हुई, जिनमें 39 हाथियों की मौत करंट लगने से हुई। अकेले सूरजपुर जिले में 41 हाथियों की जान जा चुकी है। प्रतापपुर रेंज का मोहनपुर और आसपास का इलाका हाथियों का स्थायी ठिकाना बन चुका है, लेकिन यही क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील भी माना जा रहा है।
270 गांवों में नीचे लटके हाईटेंशन तार बने खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार सरगुजा के करीब 270 गांवों में हाईटेंशन बिजली के तार हाथियों की ऊंचाई से भी नीचे लटके हुए हैं। भोजन और पानी की तलाश में गांवों तक पहुंचने वाले हाथी अक्सर इन तारों की चपेट में आ जाते हैं, जिससे उनकी मौत हो रही है।
हाथियों के छोटे झुंड बनने के तीन बड़े कारण
1. बढ़ते अवरोध और मानवीय हस्तक्षेप
बिजली के तार, खेतों की फेंसिंग, लगातार शोर और जंगलों की कटाई से हाथी खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में वे जोखिम कम करने के लिए छोटे समूहों में रहना पसंद करते हैं।
2. संख्या बढ़ी, लेकिन जंगल घटे
छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा में पिछले दो दशकों में हाथियों की संख्या बढ़ी है, जबकि उनका प्राकृतिक आवास लगातार घटा है। इससे उनके पारंपरिक माइग्रेशन मार्ग टूट गए हैं और बड़े झुंड छोटे-छोटे समूहों में विभाजित होकर अलग-अलग रास्तों से गुजर रहे हैं।
3. भोजन और पानी का संकट
जब जंगलों में पर्याप्त भोजन और जल उपलब्ध होता है, तब हाथी बड़े झुंड में रहते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी होने पर वे आपसी प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए छोटे समूहों में बंट जाते हैं। वन्यजीव विज्ञान में इस व्यवहार को ‘फ्यूजन-फिशन डायनेमिक्स’ कहा जाता है।
50 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं थमा संघर्ष
पिछले छह वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष रोकने के लिए 50 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। सोलर फेंसिंग, मधुमक्खी पालन, टॉर्च और मंजीरा जैसी योजनाएं लागू की गईं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। इसी अवधि में लगभग 10 हजार हेक्टेयर जंगल कम हो गए, जिससे हाथियों का गांवों की ओर आना लगातार बढ़ा है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि केवल राहत और मुआवजे से समस्या का समाधान संभव नहीं है। मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए हाथी गलियारों के संरक्षण, जंगलों के पुनर्स्थापन और सुरक्षित आवागमन के मार्ग विकसित करना अब सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो सरगुजा सहित पूरे उत्तरी छत्तीसगढ़ में यह संघर्ष और गंभीर रूप ले सकता है।





