देश में इन दिनों 50 साल पुराने आपातकाल की चर्चा जोरों पर है। सत्ता पक्ष इसे लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताकर जनता को याद दिला रहा है। स्कूलों की किताबों में नए अध्याय जोड़े जा रहे हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट की बाढ़ है, भाषणों में आपातकाल का जिक्र है और हर मंच से बताया जा रहा है कि 1975 में लोकतंत्र का गला घोंटा गया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ 50 साल पुरानी घटनाओं को याद करने का नाम है?
अगर आपातकाल इसलिए याद किया जा रहा है क्योंकि उस दौर में जनता की आवाज दबाई गई थी, तो क्या आज जनता के सवालों को भी उसी गंभीरता से सुना जा रहा है? अगर लोकतंत्र का मतलब जवाबदेही है, तो फिर वर्तमान सरकारों से सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है जितना अतीत की सरकारों की आलोचना करना।
देश का युवा आज बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों, पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था की अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है। लाखों छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं, परिवार अपनी जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं, लेकिन जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं तो सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं युवाओं का होता है जिनके सपनों पर देश का भविष्य टिका है।
विडंबना देखिए, 50 साल पुराने आपातकाल पर घंटों बहस होती है, लेकिन जब आज का युवा अपने भविष्य को लेकर सड़क पर सवाल पूछता है तो उसे राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने से बचा जाता है। इतिहास की गलतियों को याद रखना जरूरी है, लेकिन वर्तमान की समस्याओं पर चुप्पी भी किसी लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकती।
जनता यह नहीं कह रही कि आपातकाल पर बात मत कीजिए। जनता सिर्फ इतना पूछ रही है कि क्या इतिहास के साथ-साथ वर्तमान पर भी उतनी ही ईमानदारी से चर्चा होगी? क्या लोकतंत्र की रक्षा का दावा करने वाले लोग आज के युवाओं, छात्रों और आम नागरिकों की चिंताओं को भी उसी गंभीरता से उठाएंगे?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, बल्कि सवाल पूछने का अधिकार है। और जब जनता सवाल पूछती है तो उसका जवाब इतिहास की किताबों से नहीं, वर्तमान की नीतियों और कार्यों से दिया जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि देश केवल अतीत की राजनीति में उलझकर न रह जाए। लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब सरकारें इतिहास से सबक लें और वर्तमान की चुनौतियों का भी उतनी ही पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ सामना करें।
क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ यह याद रखने का नाम नहीं कि 50 साल पहले क्या हुआ था, बल्कि यह सुनिश्चित करने का नाम भी है कि आज ऐसा क्या हो रहा है जिस पर जनता सवाल पूछ रही है।
— नागेंद्र पांडे संपादक MBP





