गंगा में फिर खिली “जलपरियां”: सफाई अभियान ला रहा रंग

Madhya Bharat Desk
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कभी प्रदूषण की मार झेल रही गंगा अब धीरे-धीरे फिर से जीवन से भरती नजर आ रही है। इसका सबसे मजबूत संकेत है गंगा में बढ़ती डॉल्फिन्स की संख्या। इन डॉल्फिन्स को प्यार से “जलपरी” या “गंगा का टाइगर” भी कहा जाता है, और इनकी वापसी साफ तौर पर बताती है कि नदी का स्वास्थ्य सुधर रहा है।

गंगा डॉल्फिन कोई साधारण मछली नहीं, बल्कि एक स्तनधारी जीव है जिसे सांस लेने के लिए बार-बार पानी की सतह पर आना पड़ता है। यही वजह है कि ये केवल साफ और मीठे पानी में ही जीवित रह सकती हैं। ऐसे में इनकी बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि गंगा का पानी अब पहले से काफी स्वच्छ हो चुका है।

सरकार द्वारा चलाए जा रहे नमामि गंगे अभियान और प्रोजेक्ट डॉल्फिन जैसे प्रयासों का असर अब ज़मीन पर दिखने लगा है। इन योजनाओं का उद्देश्य न केवल गंगा की सफाई करना है, बल्कि डॉल्फिन जैसे संवेदनशील जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित बनाना भी है।

इसी दिशा में एक बड़ा कदम 13 जनवरी 2026 को उठाया गया, जब देश की पहली डॉल्फिन रेस्क्यू एम्बुलेंस को देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से लॉन्च किया गया। इस विशेष एम्बुलेंस की मदद से अब तक कई घायल डॉल्फिन्स का इलाज कर उन्हें सुरक्षित वापस नदी में छोड़ा जा चुका है।

गौरतलब है कि गंगा डॉल्फिन भारत की राष्ट्रीय जलीय जीव है और इसे विलुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में इसके संरक्षण के लिए सरकार लगातार गंभीर प्रयास कर रही है।

उत्तर प्रदेश में नमामि गंगे मिशन के तहत 460 से अधिक सीवेज स्रोतों को गंगा में गिरने से रोका गया है, जिससे पानी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। इसका असर यह हुआ कि अब नरोरा, कानपुर और वाराणसी जैसे इलाकों में डॉल्फिन्स को प्रजनन करते हुए भी देखा जा रहा है।

हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, गंगा में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर भी बढ़ा है, जो जलीय जीवन के लिए बेहद जरूरी होता है। फिलहाल उत्तर प्रदेश में डॉल्फिन्स की संख्या करीब 600 के आसपास आंकी गई है।

सरकार अब स्थानीय लोगों, मछुआरों और स्कूली बच्चों को भी जागरूक कर रही है, ताकि इस दुर्लभ जीव की सुरक्षा में समाज की भागीदारी बढ़ सके।

गंगा डॉल्फिन सिर्फ एक जीव नहीं, बल्कि गंगा की पहचान है और इसकी वापसी एक सकारात्मक संकेत है कि अगर प्रयास सही दिशा में हों, तो प्रकृति खुद को फिर से संवार सकती है।

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