100 करोड़ का डिजिटल घोटाला? गिरदावरी एप छोड़कर भागी कंपनी, डाउनलोड में भी खतरे की चेतावनी

Madhya Bharat Desk
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रायपुर।छत्तीसगढ़ में फसल गिरदावरी के लिए बनाई गई करीब 100 करोड़ रुपये की डिजिटल परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। राजस्व विभाग को फसलों के भौतिक सत्यापन के लिए दी गई रामटेक सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस की परियोजना पर आरोप है कि कंपनी काम पूरा किए बिना ही पीछे हट गई। इस बीच पटवारियों और सर्वेयरों को फसल सर्वे के लिए ऐसे एप का इस्तेमाल करने को कहा जा रहा है, जिसे डाउनलोड करने पर हार्मफुल सॉफ्टवेयर की चेतावनी भी मिल रही है।

राजस्व विभाग ने करीब दो वर्ष पहले फसलों के भौतिक सत्यापन के लिए रामटेक सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस को करीब 100 करोड़ रुपये की निविदा दी थी। आरोप है कि कंपनी एक साल भी परियोजना पूरी नहीं कर सकी और काम अधूरा छोड़कर चली गई। अब फसल सर्वे के लिए पटवारियों और सर्वेयरों से पीबीएफ, यानी फिजिकल वेरिफिकेशन एप, प्ले स्टोर के बजाय निजी लिंक से डाउनलोड कराए जाने की बात सामने आ रही है।

एप डाउनलोड में असुरक्षा का सवाल

आरोप है कि पीबीएफ एप डाउनलोड करते समय मोबाइल में हार्मफुल सॉफ्टवेयर का संदेश दिखाई देता है। सवाल यह उठ रहा है कि जब एप प्ले स्टोर पर उपलब्ध नहीं है और उसे निजी लिंक से इंस्टॉल कराया जा रहा है, तो उसकी सुरक्षा, डेटा प्राइवेसी और तकनीकी जांच किस स्तर पर हुई। राजस्व विभाग के लिए बनाए जा रहे ऐप की जिम्मेदारी कंपनी को सौंपी गई थी, लेकिन इसके संचालन और सुरक्षा मानकों पर अब स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा है।

सर्वर फेल, फोटो अपलोड में दिक्कत

मैदानी अमले के कर्मचारियों की ओर से एप के सर्वर के बार-बार खराब होने, खेत की फोटो अपलोड न होने और लोकेशन दर्ज करने में परेशानी की शिकायतें की जा रही हैं। इससे न केवल सर्वे का समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि फसल सर्वे के आंकड़ों की शुद्धता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में धान के वास्तविक रकबे का आकलन इसी डिजिटल डेटा के आधार पर होना है, ऐसे में तकनीकी खामियां बड़ी चुनौती बन गई हैं। पटवारी संघ पहले से ही पीवी एप से गिरदावरी करने का विरोध करते रहे हैं और इसे अपने मूल कार्य से अलग बताया है।

क्या दर्ज करना होता है एप में

इस एप में सर्वेयर को खेत की चारों दिशाओं के अक्षांश-देशांतर, यानी लैटिट्यूड-लॉन्गिट्यूट, दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही पटवारियों को यह जानकारी देनी होती है कि धान कहां से खरीदा गया और किसान ने कौन-सी धान किस्म लगाई है। खरीदे गए बीज के बोरे पर रेफरेंस नंबर लिखाकर बीज की जानकारी का सत्यापन भी कराया जा रहा है। यह पूरी प्रक्रिया फसल के वास्तविक क्षेत्र और खरीद से जुड़ी जानकारी को डिजिटल रूप से तय करने के लिए अपनाई गई है।

जवाबदेही का सवाल

जिस डिजिटल व्यवस्था से धान का वास्तविक रकबा, बीज की जानकारी और फसल सत्यापन तय होना है, वहीं सिस्टम की खामियां सीधे किसानों और मैदानी अमले को प्रभावित कर रही हैं। राजस्व विभाग के सामने अब तीन बड़े सवाल हैं कि कंपनी द्वारा परियोजना अधूरी छोड़ने पर क्या कार्रवाई होगी, एप की सुरक्षा जांच कौन करेगा, और सर्वर व डेटा अपलोड की समस्याओं का समाधान कब होगा। छत्तीसगढ़ में डिजिटल क्रॉप सर्वे और पीवी एप से गिरदावरी को लेकर पहले से ही पटवारियों और कृषि अमले में असंतोष मौजूद है, जिससे यह विवाद और गंभीर हो गया है।

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