रायपुर।छत्तीसगढ़ में गड्ढों में तब्दील हो चुकी सड़कों और लोक निर्माण विभाग (PWD) की सुस्त कार्यप्रणाली ने राज्य सरकार की साख पर बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। एक तरफ उप मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मंत्री अरुण साव महकमे की नाकामी पर समीक्षा बैठकों में अपनी सख्ती दिखा रहे हैं, तो दूसरी तरफ विभाग के भीतर चल रहे खेल और प्रशासनिक बयानों ने इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक संदिग्ध बना दिया है।
क्या यह संकट केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ने का नतीजा है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक-प्रशासनिक नेक्सास काम कर रहा है? आइए जानते हैं इस मामले के सभी सुलगते पहलू।
PWD सचिव की केंद्र को सौंपने की चेतावनी
हाल ही में PWD सचिव मुकेश बंसल ने प्रदेश में सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी। सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि बैठक के दौरान अधिकारियों की जमकर क्लास ली गई और यहाँ तक कह दिया गया— यदि आप लोग काम नहीं संभाल सकते, तो इन सड़कों को सेंट्रल गवर्नमेंट (केंद्र सरकार) को ट्रांसफर कर देते हैं।
मंत्री अरुण साव की भूमिका
विभाग के मुखिया होने के नाते उप मुख्यमंत्री अरुण साव के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उनके अपने ही अधिकारी और सचिव इस तरह की बातें कर रहे हैं, तो मैदानी स्तर पर काम सुधारने की बजाय केवल बैठकों में फटकार लगाने से जनता को क्या राहत मिलेगी?
Below रेट पर टेंडर का झोल और डामर का बहाना
विवाद की जड़ में यह बात भी है कि कई शातिर ठेकेदारों PWD अधिकारियों के साथ मिलकर अनुमानित लागत से भी 20-30% प्रतिशत या उससे कम दरों पर टेंडर हथिया लिए। जब कम दरों पर काम ले ही लिया गया था, तो अब डामर (बिटुमिन) की कीमतों में मामूली उतार-चढ़ाव का हवाला देकर काम रोकने या कछुए की चाल चलाने का ड्रामा क्यों रचा जा रहा है?
- रायपुर नगर निगम क्षेत्र में 15वें वित्त आयोग के तहत बनने वाली 6 सड़कों का हाल इसका जीता-जाता उदाहरण है। इनमें से कई सड़कों पर या तो काम शुरू ही नहीं हुआ, बाकी का हाल 10 से 60 प्रतिशत की धीमी रफ्तार के बीच अटका हुआ है।
- सरकार ने डामर की बढ़ी कीमतों को देखते हुए राहत और मूल्यवृद्धि के समायोजन का रास्ता भी निकाला, फिर भी काम का ठप रहना ठेकेदारों की नीयत और विभागीय मॉनिटरिंग की पोल खोलता है।
700 से 800 करोड़ के नुकसान का दावा और नेक्सस का खेल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सनसनीखेज सवाल 700 से 800 करोड़ रुपये के कथित नुकसान और बड़े षड्यंत्र को लेकर उठ रहा है। इसके पीछे अधिकारी, ठेकेदार और राजनीतिक-प्रशासनिक स्तर का एक बड़ा नेक्सस काम कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश की अधिकांश सड़कों का निचला हिस्सा (बेस) पहले से ही ठीक स्थिति में है। ऐसे में केवल ऊपर बिटुमन की सही लेवलिंग और कारपेटिंग कर देने भर से सड़कें मजबूत हो सकती हैं। लेकिन ठेकेदार और अधिकारीयों का नेक्सस चाहता ही नहीं कि काम सरल तरीके से हो; वे इसे बड़े भ्रष्टाचार का जरिया बनाकर सरकारी खजाने को चूना लगाने की फिराक में हैं।
- याद कीजिए छत्तीसगढ़ का वह पुराना 200 करोड़ रुपये का डामर घोटाला, जिसमें एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के 1,200 करोड़ रुपये के कर्ज से बनी 21 सड़कों में भारी गड़बड़ी के आरोप लगे थे और मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा था। आज एक बार फिर वैसी ही सुगबुगाहट यह चीख-चीख कर कह रही है कि विभाग के भीतर पुरानी आदतें बदली नहीं हैं।
चेतावनियों से काम नहीं चलेगा
जनता को अब कोरे आश्वासनों, बैठकों की फटकार जैसे बयानों से राहत नहीं मिलने वाली। मंत्री अरुण साव और शासन के सामने सबसे बड़ी कसौटी यह है कि वे इस तथाकथित 700-800 करोड़ के नेक्सास की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच कराएं।
यदि ठेकेदार और अधिकारी मिलकर भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख रहे हैं, तो उन पर केवल कागजी नोटिस नहीं, बल्कि ऐसी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए






