रायपुर/राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी की तैयारी अभी शुरू ही हुई है कि तिरपाल, कैप कवर, सुतली और सीसीटीवी कैमरे की खरीदी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रदेश की 2,573 सहकारी समितियों और 3,160 उपार्जन केंद्रों के लिए होने वाली इस खरीदी की जिम्मेदारी इस बार अपेक्स बैंक को दिए जाने से जिला सहकारी बैंकों और प्राथमिक कृषि समितियों में भारी नाराजगी है।
नियमानुसार धान खरीदी के लिए जरूरी सामग्री खरीदने का अधिकार जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के अधीन काम करने वाली समितियों को है। ये समितियां अब तक जेम पोर्टल के जरिए स्थानीय स्तर पर खरीदी करती रही हैं। लेकिन इस बार सहकारिता आयुक्त के आदेश के बाद अपेक्स बैंक से पूरे प्रदेश की खरीदी कराए जाने की बात कही जा रही है। आरोप है कि इसमें जेम पोर्टल को भी बायपास किया जा रहा है।
जिला बैंकों ने उठाया विरोध
प्रदेश के पांच से छह जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों ने इस केंद्रीकृत व्यवस्था का कड़ा विरोध किया है। इन बैंकों ने पंजीयक सहकारी संस्थाओं को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। विरोधकर्ताओं का कहना है कि समितियां स्वायत्त संस्थाएं हैं और उनके खरीद अधिकार पर अपेक्स बैंक का नियंत्रण थोपना गलत है।
दुर्ग जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष प्रीतपाल बेलचंदन ने कहा कि छह जिला बैंकों के अध्यक्षों ने निर्णय लिया है कि पैक्स समितियों की स्वायत्तता पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तिरपाल एक बार खरीदने पर लगभग तीन साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है, ऐसे में हर साल नई खरीदी थोपना समितियों के लिए नुकसानदायक होगा।
बस्तर जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष दिनेश कश्यप ने दूसरी चिंता जताई। उनके अनुसार बस्तर संभाग के कई खरीदी केंद्र दुर्गम इलाकों में हैं, जहां राजधानी से समय पर तिरपाल पहुंचाना मुश्किल होगा। पहले आपात स्थिति में समितियां स्थानीय स्तर पर तुरंत व्यवस्था कर लेती थीं, लेकिन अब टेंडर प्रक्रिया पर निर्भर रहने से दिक्कत आ सकती है।
भाजपा समर्थित अध्यक्षों का मोर्चा
विवाद की सबसे बड़ी बात यह है कि विरोध करने वाले कई अध्यक्ष भाजपा समर्थित बताए जा रहे हैं। इससे सरकार के सामने भी सवाल खड़े हो गए हैं। समितियों का आरोप है कि नई व्यवस्था में अपेक्स बैंक सीधे वेंडर भेजकर सामग्री की सप्लाई करेगा, जबकि भुगतान समितियों को ही करना होगा।
आरोप लगाया जा रहा है कि यह पूरी प्रक्रिया गुजरात की एक कंपनी को फायदा पहुंचाने और कमीशनखोरी के लिए की जा रही है। साथ ही परिवहन खर्च को लेकर भी शक जताया जा रहा है। समितियों का कहना है कि स्थानीय खरीदी से ट्रांसपोर्ट खर्च बचता था, लेकिन केंद्रीकृत सप्लाई से शासन के खजाने पर बोझ बढ़ेगा और स्थानीय व्यापारी भी बाहर हो जाएंगे।
आयुक्त का इनकार
इस विवाद पर सहकारिता आयुक्त एवं पंजीयक रमेश शर्मा ने कहा है कि उनके कार्यकाल में ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है। जिला बैंकों के विरोध पत्र पर उन्होंने कहा कि वे जांच करवाकर देखेंगे कि समितियां वास्तव में क्या चाह रही हैं।
धान खरीदी के मौसम में यह विवाद बताता है कि सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता, स्थानीय खरीद व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों के बीच तनाव कितना गहरा है। अब देखना होगा कि शासन जिला बैंकों की आपत्तियों पर क्या कदम उठाता है।






