बस्तर में आदिवासियों के पवित्र देव स्थल और बहुत ही समृद्ध जैव विविधता वाले नंदराज पहाड़ का भी भाजपा की साय सरकार विनाश कर रही है। आदिवासियों की आस्था के केंद्र और जैव विविधता से भरपूर नंदराज पहाड़ (डिपॉजिट-13) में खनन का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। वर्षों पहले भारी आदिवासी विरोध के बाद जिस खनन परियोजना की ग्रामसभा अनुमति को लेकर जांच हुई थी और उसे ‘शून्य’ पाया गया था, उसी प्रक्रिया और अनुमतियों के आधार पर अब दोबारा खुदाई की तैयारी के आरोप सामने आ रहे हैं।
सवाल यह कि नंदराज पहाड़ का 2019 में भारी विरोध हुआ था और हिरोली गाँव की ग्रामसभा प्रस्ताव की जाँच के आदेश शासन ने दिए थे। कलेक्टर की जाँच रिपोर्ट में ग्रामसभा प्रस्ताव फर्जी पाए गए थे और कलेक्टर ने ही वन स्वीकृति शून्य घोषित करने की अनुशंसा की थी। इसके बाद 6 मार्च 2020 को वन विभाग ने NMDC को नोटिस जारी कर वन स्वीकृति निरस्त करने की प्रक्रिया चलाई थी। फिर बिना पुनः ग्रामसभा सहमति लिए यह वन स्वीकृति वैध कब हो गई और खनन किस आधार पर शुरू किया जा रहा है?
अब आरोप है कि जिन अनुमतियों और दस्तावेजों की वैधता पर पहले जांच में सवाल उठ चुके हैं, उन्हीं के आधार पर नंदराज पहाड़ क्षेत्र में फिर खुदाई की तैयारी की जा रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, नंदराज पहाड़ से माइनिंग के जरिए निकले कच्चे लोहे की टेस्टिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और सैंपल नगरनार स्टील प्लांट भेजे गए हैं। संयुक्त पंचायत जन संघर्ष समिति का कहना है कि नंदराज पहाड़ उनकी आराध्य पिटोर रानी माता का स्थान है। 50 से ज्यादा गांवों के ग्रामीण दोबारा उग्र आंदोलन की तैयारी में जुट गए हैं। इस मामले में एस्सार और NMDC की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर खनन पट्टा NCL (NMDC CMDC Limited) के नाम पर है।


नंदराज पहाड़ आदिवासी समाज के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का केंद्र है। इसलिए यहां खनन का विरोध केवल पर्यावरण या जमीन का मुद्दा नहीं, बल्कि देवस्थल, ग्रामसभा की सहमति और आदिवासी अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। आदिवासियों का मानना है कि नंदराज पहाड़ उनके प्रकृति के देवता नंदराज और उनकी पत्नी पितोद देवी का निवास स्थान है। लौह अयस्क के नाम पर पूरा पहाड़ ही खोद दिया गया तो यह उनके देवता के निवास स्थान को नष्ट करना है। क्या हसदेव से लेकर नंदराज पहाड़ के विनाश के ख़िलाफ़ विरोध को कुचलने ही प्रदेश में NSA लगाया गया है? कई बार शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आई हैं। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि PESA Act और Forest Rights Act के तहत ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस ग्रामसभा की वैधता पर सरकारी जांच में सवाल उठ चुके हैं, उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर आगे की खनन गतिविधियों को किस आधार पर अनुमति दी जा रही है? यदि वर्तमान खुदाई के लिए नई ग्रामसभा, नई पर्यावरणीय/वन स्वीकृति या अन्य वैधानिक अनुमति ली गई है, तो उसकी स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।





