जहां कभी गूंजते थे धमाके, आज वहां खेतों में गूंज रहे हैं बस्तर के लोकगीत

Madhya Bharat Desk
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जगदलपुर।बस्तर की धरती पर अब बम और गोलियों की आवाज नहीं, बल्कि गांव की माता-बहनों के होठों से निकलते लोकगीत सुनाई दे रहे हैं। ये गीत लोगों के दिल को सुकून देते हैं और पूरे माहौल को खुशियों से भर देते हैं। मानसून के साथ बस्तर में धान की रोपाई तेज़ी से चल रही है। किसान खुश हैं, किसान परिवारों की महिलाएं उत्साह से खेतों में जुटी हैं और मजदूर भी पूरे मन से काम कर रहे हैं। यही खुशी अब खेतों और जंगलों में गूंजते लोकगीतों में साफ दिखाई दे रही है।

नक्सल हिंसा के डर से काफी हद तक बाहर निकल चुके बस्तर के लोग अब पहले से ज्यादा सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं। जहां पहले हर समय डर का माहौल रहता था, वहीं अब लोग बिना भय के खेतों और जंगलों में अपने रोजमर्रा के काम कर रहे हैं। केंद्र की मोदी सरकार की पहल और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में हुए बदलाव का असर लोगों की जिंदगी में दिखाई देने लगा है। बस्तर में बड़े उद्योग नहीं हैं, इसलिए यहां खेती और जंगल ही लोगों की आजीविका का मुख्य सहारा हैं। खेतों की फसल और जंगल से मिलने वाली वनोपज से ही अधिकांश परिवारों का गुजारा चलता है।

अब बस्तर के गांवों में फिर से लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगी है। ऐसा ही नजारा बस्तर विकासखंड के ग्राम मधोटा-2 के खैरगुड़ा में देखने को मिला। यहां धान रोपाई पूरे उत्साह के साथ चल रही है। सुबह से शाम तक महिलाएं नंगे पांव कीचड़ में उतरकर धान की रोपाई करती हैं और काम करते-करते ददरिया और जगार जैसे पारंपरिक लोकगीत गाती रहती हैं। इन गीतों से पूरा खेत सांस्कृतिक रंग में रंग जाता है।

खैरगुड़ा में धान रोपाई सिर्फ खेती का काम नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और परंपरा का भी सुंदर उदाहरण है। महिलाएं पहले नर्सरी से धान के पौधे निकालती हैं, फिर उनकी गड्डियां बनाकर कतारों में रोपाई करती हैं। इस दौरान गांव की बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को खेती के पारंपरिक तरीके और लोकगीतों की विरासत भी सिखाती हैं।

गांव की महिलाएं घर का काम पूरा करने के बाद टिफिन लेकर खेत पहुंच जाती हैं। दोपहर में थोड़ी देर आराम और भोजन के बाद फिर शाम तक रोपाई का काम चलता है। कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को भी साथ लाती हैं, जो खेत की मेड़ पर खेलते रहते हैं। गांव में आज भी एक-दूसरे के खेत में मिलकर काम करने की परंपरा कायम है। इससे सभी किसानों के खेतों की रोपाई समय पर पूरी हो जाती है। दोपहर में सभी महिलाएं साथ बैठकर भोजन करती हैं, जिससे आपसी मेलजोल और भाईचारा भी मजबूत होता है।

गांव की किसान मंदना ठाकुर बताती हैं कि समय पर धान की रोपाई पूरे साल की खेती और परिवार की खाद्यान्न सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी होती है। उनके मुताबिक पुरुष जहां जोताई और सिंचाई का काम संभालते हैं, वहीं रोपाई की सबसे बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं की होती है। खैरगुड़ा की महिलाएं इस काम में काफी अनुभवी हैं। उन्हें पौधे कितनी गहराई और कितनी दूरी पर लगाने हैं, इसका वर्षों का अनुभव है, जिससे अच्छी पैदावार मिलती है। गांव की कई महिलाएं पिछले 30 साल से यह काम कर रही हैं और अब नई पीढ़ी की लड़कियां भी अपनी मां और दादी के साथ खेतों में उतर रही हैं।

प्रिया बघेल, कुसुमलता, सत्यबती और सुंदरी बाई का कहना है कि लोकगीत गाते हुए काम करने से थकान महसूस नहीं होती और पूरा दिन खुशी-खुशी गुजर जाता है।

बस्तर की खेती आज भी महिलाओं और पुरुषों की साझा मेहनत, अनुभव और पारंपरिक ज्ञान पर टिकी हुई है। खैरगुड़ा की महिलाएं अपनी मेहनत और समर्पण से यह संदेश दे रही हैं कि खेती केवल रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि बस्तर की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता की मजबूत पहचान भी है।

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