रैट किल का इलाज या मेडिकल एक्सपेरिमेंट? आखिर सुकमा जिला अस्पताल में चल क्या रहा है?

Madhya Bharat Desk
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जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एक बार फिर विवादों में घिर गया है। इस बार आरोप है कि रैट किल (चूहे मारने की दवा) पीने वाले युवक के इलाज में गंभीर लापरवाही बरती गई, जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ गई और उसे ICU में भर्ती करना पड़ा। मामला सामने आने के बाद जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली और डॉक्टरों के उपचार के तरीकों पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार कोसाबंदर निवासी 22 वर्षीय युवक मुकेश करटामी (युवराज करटामी) ने गलती से चूहे मारने की दवा का सेवन कर लिया था। परिजन उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन आरोप है कि उपचार के दौरान ऐसा इंजेक्शन लगाया गया जिसका उपयोग आमतौर पर ऑर्गेनोफॉस्फेट (कीटनाशक) विषाक्तता के मामलों में किया जाता है।

अस्पताल के उपचार रिकॉर्ड के अनुसार मरीज को Inj. PAM (Pralidoxime) दिया गया। स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि सामान्य रैट किल विषाक्तता के मामलों में इस इंजेक्शन की कोई विशेष भूमिका नहीं होती। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या मरीज की सही जांच और निदान किया गया था या बिना स्पष्ट पुष्टि के उपचार शुरू कर दिया गया।

सूत्रों का दावा है कि इलाज के दौरान मौजूद कुछ स्वास्थ्य कर्मी भी इस निर्णय को लेकर असमंजस में थे, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के सामने किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई। आरोप है कि गलत उपचार के कारण मरीज की हालत में सुधार होने के बजाय और गिरावट आई, जिसके बाद उसे ICU में भर्ती करना पड़ा।

इलाज या प्रयोग?

इस घटना ने जिला अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विषाक्तता के मामले में उपचार शुरू करने से पहले सही निदान सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि बिना पर्याप्त जांच के दवाएं और इंजेक्शन दिए जाएं तो मरीज की जान भी खतरे में पड़ सकती है।

अब सवाल यह है कि क्या जिला अस्पताल में मानक चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है, या मरीजों पर ‘ट्रायल एंड एरर’ के आधार पर उपचार किया जा रहा है? मामले को लेकर स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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