कोरबा। जिले के सतरेंगा गांव में एक ऐसा विशाल साल वृक्ष मौजूद है, जो सिर्फ एक पेड़ नहीं बल्कि ग्रामीणों की आस्था और प्रकृति संरक्षण की मिसाल बन चुका है। करीब 1400 वर्ष पुराना यह महावृक्ष सदियों से गांव की पहचान बना हुआ है। यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले इस वृक्ष की पूजा-अर्चना करते हैं और इसका आशीर्वाद लेना जरूरी मानते हैं।
कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर बालको वन परिक्षेत्र के सतरेंगा गांव में स्थित यह साल वृक्ष देश के सबसे पुराने जीवित साल वृक्षों में शामिल माना जाता है। वर्ष 2006 में इसकी विशेष पहचान सामने आने के बाद विशेषज्ञों ने इसका अध्ययन किया था। वैज्ञानिक जांच में इसकी आयु 1400 वर्ष से अधिक आंकी गई, जिससे इसकी ऐतिहासिक महत्ता और भी बढ़ गई।
यह वृक्ष करीब 28 मीटर ऊंचा है, जबकि जमीन के पास इसकी परिधि लगभग 28 फीट दो इंच मापी गई है। इसका विशाल तना और घना फैलाव दूर से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। वन विभाग ने इसकी ऐतिहासिक और पर्यावरणीय महत्ता को देखते हुए इसे संरक्षित किया है। वृक्ष के आसपास सुरक्षा व्यवस्था और जानकारी के लिए चबूतरा भी बनाया गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में लंबे समय से हरे-भरे पेड़ों को काटने की परंपरा नहीं है। जरूरत पड़ने पर केवल सूखे पेड़ों का ही उपयोग किया जाता है। लोगों का मानना है कि पेड़-पौधे जीवन, जल और खुशहाली का आधार हैं। यही सोच इस प्राचीन वृक्ष को पीढ़ियों से सुरक्षित रखे हुए है।
हर शुभ कार्य से पहले होती है पूजा
सतरेंगा गांव में इस साल वृक्ष को देव स्वरूप माना जाता है। शादी-विवाह, गृह प्रवेश, नई फसल की शुरुआत या अन्य किसी शुभ अवसर पर ग्रामीण सबसे पहले यहां पहुंचकर पूजा करते हैं। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।
विशाल आकार से अलग बनती है पहचान
करीब 1400 साल पुराना यह साल वृक्ष अपनी उम्र के साथ-साथ अपने विशाल आकार के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई 28 मीटर से अधिक है और इसका फैलाव काफी बड़ा है। यही वजह है कि इसे क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर माना जाता है।
पर्यावरण संरक्षण की मिसाल
जलवायु परिवर्तन और लगातार घटते वन क्षेत्र के बीच सतरेंगा का यह महावृक्ष लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देता है। यह साबित करता है कि अगर समाज और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे तो प्राकृतिक धरोहरों को सदियों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। आस्था और पर्यावरण संरक्षण का यह अनूठा संगम आज भी लोगों को प्रेरित कर रहा है।





