अडानी द्वारा संचालित कोल ब्लॉक के लिए राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य जंगल में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वन भूमि उपयोग बदलने की अनुमति मांगी है। प्रस्ताव के तहत करीब 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन और लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई की मंजूरी मांगी गई है। यह मामला फिलहाल पर्यावरण मंत्रालय की फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी (FAC) के पास विचाराधीन है।
इस प्रस्ताव पर 8 मई को FAC की बैठक में चर्चा होने वाली थी, जो वन भूमि डायवर्जन की मंजूरी देने वाली प्रमुख समिति है।
यह कोल ब्लॉक वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार की बिजली कंपनी को आवंटित किया गया था। इसका उद्देश्य राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ थर्मल पावर प्लांट के लिए कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
हसदेव-अरण्य को मध्य भारत का बेहद संवेदनशील और घना वन क्षेत्र माना जाता है। यह छत्तीसगढ़ के सरगुजा, कोरबा और सूरजपुर जिलों में फैला है। यहां साल वृक्षों का घना जंगल है और तेंदुआ, हाथी, भालू जैसी कई संरक्षित वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं। यह क्षेत्र हसदेव नदी और बांगो बांध का महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र भी है। साथ ही इसे हाथियों के मूवमेंट का बड़ा कॉरिडोर माना जाता है। स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका, संस्कृति और जीवन भी इसी जंगल पर निर्भर है। रामगढ़ की पहाड़ियां भी इसी क्षेत्र का हिस्सा हैं, जिन्हें धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी वन क्षेत्र में पहले से ही परसा और परसा ईस्ट केते बसन जैसी कोयला खदानें संचालित हो रही हैं। पहले इसे पर्यावरणीय दृष्टि से “नो-गो ज़ोन” के रूप में भी चिन्हित किया गया था, जहां खनन को लेकर सख्त आपत्ति जताई जाती रही है।

सरगुजा के आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ताओं, अंबिकापुर के स्थानीय नागरिक संगठनों और आदिवासी समूहों ने इस नए प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित कई संगठनों का कहना है कि बिजली जरूरतों का जो हवाला दिया जा रहा है, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाता। उनका यह भी कहना है कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) ने राजस्थान की भविष्य की बिजली मांग का अनुमान पहले से कम कर दिया है, फिर भी अतिरिक्त कोयला खदान की जरूरत बताना गलत है।
पर्यावरण मंत्रालय ने भी क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की योजना पर सवाल उठाए हैं। प्रस्ताव में 3,236.08 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण की बात कही गई है, लेकिन इसमें कई जगह पहले से मौजूद वन भूमि और मध्यम घनत्व वाले जंगल शामिल हैं। यानी एक जंगल काटकर दूसरे जंगल को ही “वनीकरण” के रूप में दिखाने पर आपत्ति जताई जा रही है।
वहीं कंपनी का कहना है कि उसका पूरा प्रस्ताव वन संरक्षण कानून 1980 और 29 दिसंबर 2023 को जारी केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों के तहत तैयार किया गया है।
हसदेव-अरण्य में यह विवाद एक बार फिर जंगल संरक्षण और कोयला खनन के बीच टकराव को सामने ला रहा है। अब फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि देश के इस संवेदनशील जंगल को बचाया जाता है या ऊर्जा जरूरतों के नाम पर इसमें खनन को आगे बढ़ाया जाता है।


