भारत सरकार ने पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता दिनेश त्रिवेदी को बांग्लादेश में भारत का नया उच्चायुक्त नियुक्त किया है। वे प्रणय वर्मा की जगह लेंगे। लेकिन इस नियुक्ति के साथ ही कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं क्या यह सिर्फ एक अनुभवी नेता को जिम्मेदारी सौंपना है या इसके पीछे कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय रणनीति छिपी है?
1990 की ‘राज्यसभा’ और अरुण नेहरू की रणनीति
दिनेश त्रिवेदी का राजनीतिक सफर किसी दिलचस्प कहानी से कम नहीं रहा। 1980 के दशक में कांग्रेस में ज्यादा पहचान नहीं बना पाए त्रिवेदी की किस्मत तब बदली जब बोफोर्स विवाद के बाद वी.पी. सिंह ने ‘जन मोर्चा’ का गठन किया। जानकार मानते हैं कि उनकी एंट्री के पीछे अरुण नेहरू की अहम भूमिका थी।
- सत्यपाल मलिक का सुझाव: मार्च 1990 में जब गुजरात से राज्यसभा के लिए नाम तय किया जा रहा था, तब सत्यपाल मलिक और आरिफ मोहम्मद खान ने अरुण नेहरू को त्रिवेदी का नाम सुझाया।
- गुजराती मूल का समीकरण: कोलकाता में रहने के बावजूद उनका गुजराती मूल उस समय की राजनीति में फिट बैठा। 10 अप्रैल 1990 को राज्यसभा पहुंचने के बाद उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखी।
‘शिकागो स्कूल’ और अमेरिकी कनेक्शन की चर्चा
राजनयिक हलकों में यह भी चर्चा है कि त्रिवेदी की नियुक्ति भारत की क्षेत्रीय नीति और वैश्विक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश हो सकती है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उनकी विदेशी शिक्षा और आर्थिक समझ उन्हें इस भूमिका में अलग पहचान दे सकती है। हालांकि आलोचक इसे महज राजनीतिक नियुक्ति बताते हुए सवाल भी उठा रहे हैं।
अडानी, बिजली और बांग्लादेश की चुनौती
बांग्लादेश इस समय आर्थिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। वहीं, बिजली आपूर्ति को लेकर गौतम अडानी की कंपनी से जुड़े मुद्दे पहले से चर्चा में हैं। ऐसे में यह नियुक्ति कई मायनों में अहम मानी जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या दिनेश त्रिवेदी ढाका में भारत के हितों को मजबूती देंगे या यह कदम किसी बड़े रणनीतिक और आर्थिक एजेंडे का हिस्सा है?
दिनेश त्रिवेदी: प्रोफाइल
दिनेश त्रिवेदी का जन्म कराची मूल के एक गुजराती परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम हीरालाल और माता का नाम उर्मिला बैन है। उन्होंने अमेरिका के शिकागो से MBA की पढ़ाई की। पेशे से पायलट होने का दावा भी किया जाता है।
राजनीतिक करियर में वे कई दलों का हिस्सा रहे कांग्रेस, जन मोर्चा, जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और अंततः भाजपा। वे भारत के पूर्व रेल मंत्री भी रह चुके हैं।



