E-20 का विरोधाभास: धान विलेन तो इथेनॉल हीरो क्यों? पानी के संकट के बीच एक कड़वा सच

Madhya Bharat Desk
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भारत में हरित ऊर्जा (Green Energy) की दिशा में ‘इथेनॉल’ को एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाना (E-20) है। लेकिन इस चमक-धमक वाली उपलब्धि के पीछे एक गहरा जल-संकट छिपा है। सवाल खड़ा हो रहा है कि जिस ‘जुर्म’ (अत्यधिक पानी की खपत) के लिए धान की खेती को ‘विलेन’ बताया जाता है, उसी जुर्म के बावजूद इथेनॉल को ‘हीरो’ की तरह क्यों पेश किया जा रहा है?

आंकड़ों का गणित: ₹65 के इथेनॉल के लिए ₹300 का पानी स्वाहा!

इथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया पानी की भारी मांग करती है। जानकारों के मुताबिक, अगर पानी की कीमत महज 10 पैसे प्रति लीटर भी मान ली जाए, तो एक लीटर इथेनॉल तैयार करने में ₹300 मूल्य का पानी खर्च हो जाता है।

“विडंबना देखिए कि जिस इथेनॉल की बाजार में कीमत अधिकतम ₹65 प्रति लीटर है, उसे बनाने में प्रकृति का इतना बेशकीमती संसाधन झोंका जा रहा है। यह मुनाफे का सौदा है या भविष्य की बर्बादी?”

इथेनॉल के ‘सिक्के’ के दो पहलू

सिस्टम इथेनॉल पर इतना जोर क्यों दे रहा है? इसके पीछे के आर्थिक और पर्यावरणीय तर्क काफी मजबूत हैं, लेकिन वे पानी की कीमत पर आते हैं।

पक्ष: फायदे जो गिनाए जा रहे हैं

विदेशी मुद्रा की बचत: 2014-15 से जून 2025 तक इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण ₹1,40,000 करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाई गई।

कार्बन उत्सर्जन में कमी: लगभग 717 लाख मीट्रिक टन शुद्ध CO2 उत्सर्जन कम हुआ है।

 किसानों को लाभ: कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम हुई और किसानों को ₹1,21,000 करोड़ से अधिक का त्वरित भुगतान मिला

विपक्ष:जो अनसुना किया जा रहा है

गिरता जलस्तर: देश के कई राज्यों में भूजल (Groundwater) ‘पाताल’ में चला गया है।

खेती बनाम पेयजल: भविष्य में पीने के पानी और सिंचाई के बीच एक बड़ा संघर्ष खड़ा हो सकता है।

क्षेत्रीय असमानता: महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहाँ महिलाएं पीने के पानी के एक घड़े के लिए कोसों पैदल चलती हैं, वहां शुगर मिलों और इथेनॉल प्लांटों द्वारा पानी का अंधाधुंध उपयोग एक नैतिक प्रश्न खड़ा करता है।

धान पर ‘गाज’ और इथेनॉल पर ‘नाज़’ क्यों?

अक्सर कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं द्वारा यह कहा जाता है कि धान की खेती छोड़ देनी चाहिए क्योंकि यह ‘वॉटर गज़लर’ (पानी सोखने वाली फसल) है। लेकिन इथेनॉल, जो मुख्य रूप से गन्ने (जिसमें धान से भी अधिक पानी लग सकता है) या अनाज से बनता है, उसे ‘इको-फ्रेंडली’ मानकर प्रमोट किया जा रहा है।

यह दोहरा मापदंड भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। क्या हम तेल की आत्मनिर्भरता के चक्कर में जल-विहीन भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं?

कब समझेंगे पानी की कीमत?

इथेनॉल के आर्थिक फायदे निर्विवाद हैं, लेकिन पानी की कोई ‘रिप्लेसमेंट’ नहीं है। जब तक हम पानी को ‘मुफ्त’ का संसाधन मानकर खर्च करेंगे, तब तक संरक्षण के भाषण खोखले ही रहेंगे। जरूरत है कि ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच एक संतुलन बनाया जाए, वरना आने वाली पीढ़ियां शायद कारें तो चला लेंगी, लेकिन पीने को पानी नहीं ढूँढ पाएंगी।

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