वेदांता लिमिटेड की प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना लंबे समय से विवादों के केंद्र में है। लंबे समय से इस परियोजना का विरोध कर रहे स्थानीय ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे किसी भी बाहरी दबाव में नहीं आएंगे और अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आंदोलन जारी रखेंगे। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व पर सीधा हमला है।
ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में आदिवासी समुदाय ने इस विरोध को अब और तेज कर दिया है। हाल ही में आयोजित एक शपथ कार्यक्रम में सैकड़ों ग्रामीणों ने एकजुट होकर भगवान बिरसा मुंडा और डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर कसम खाई कि वे अपनी पहाड़ियों को किसी भी कीमत पर खनन के लिए नहीं सौंपेंगे। यह शपथ सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा का संकल्प बन गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिन पहाड़ों को कंपनियां सिर्फ खनिज संसाधन के रूप में देखती हैं, वही उनके लिए जीवन का आधार हैं। यही पहाड़ उनकी संस्कृति, परंपरा और आजीविका से जुड़े हुए हैं। उनका आरोप है कि वेदांता की यह परियोजना पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ हजारों लोगों के जीवन को भी संकट में डाल देगी।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर सरकार और कंपनी दोनों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी परियोजना को लागू करने से पहले स्थानीय समुदाय की सहमति जरूरी है, लेकिन यहां उनकी आवाज को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह आंदोलन अब केवल जमीन का नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और आदिवासी अस्मिता की रक्षा का प्रतीक बनता जा रहा है।
वहीं, इस पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। अब देखना होगा कि सरकार आदिवासियों के विरोध के बीच इस परियोजना को आगे बढ़ाती है या फिर बातचीत के जरिए कोई समाधान निकालती है।
फिलहाल, पहाड़ों में एक ही नारा गूंज रहा है
“जय बिरसा, जय भीम… पहाड़ नहीं देंगे।”






