खेल के मैदानों पर ‘कॉमर्शियल’ खेल? सरकार की नीति पर गरमाई राजनीति

Madhya Bharat Desk
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मुंबई के खेल मैदानों को लेकर सियासत तेज हो गई है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने महायुति सरकार की नई नीति पर कड़ा विरोध जताया है। इस नीति के तहत खेल के लिए आरक्षित जमीन के एक हिस्से को व्यावसायिक उपयोग जैसे होटल और मॉल के लिए खोलने का प्रावधान किया गया है।

शिवसेना (यूबीटी) का आरोप है कि यह कदम खेलों के विकास के नाम पर बिल्डरों को फायदा पहुंचाने की कोशिश है। पार्टी के मुखपत्र सामना में प्रकाशित संपादकीय में इस नीति को “खेल मैदानों पर कब्जे की योजना” बताया गया है।

नीति के मुताबिक, बड़े भूखंडों पर 70% हिस्सा खेल गतिविधियों के लिए रखा जाएगा, जबकि बाकी 30% जमीन का उपयोग व्यावसायिक परियोजनाओं जैसे फाइव स्टार होटल और शॉपिंग मॉल के लिए किया जा सकेगा। यही हिस्सा विपक्ष के निशाने पर है।

संपादकीय में यह भी आरोप लगाया गया है कि सरकार इस फैसले के जरिए भारत का सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज कर रही है और बैकडोर से बिल्डरों को लाभ पहुंचा रही है। पार्टी का कहना है कि इससे मुंबई जैसे शहर में पहले से कम हो रहे खुले मैदान और भी सिमट जाएंगे।

उद्धव गुट ने यह आशंका भी जताई है कि शुरुआत में भले ही 30% जमीन व्यावसायिक उपयोग के लिए दी जा रही हो, लेकिन धीरे-धीरे पूरा क्षेत्र ही कमर्शियल कब्जे में जा सकता है। इससे खेल संस्कृति और युवाओं के लिए उपलब्ध स्पेस पर गंभीर असर पड़ सकता है।

वहीं, सरकार का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों के लिए आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है, और इसके लिए इस तरह के मॉडल की आवश्यकता है। लेकिन विपक्ष सवाल उठा रहा है कि जब मामला खेलों का है, तो इसे शहरी विकास विभाग क्यों संभाल रहा है और इससे होने वाली कमाई का हिसाब-किताब क्या होगा।

इस विवाद के बीच कई ऐतिहासिक मैदानों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। शिवाजी पार्क, आज़ाद मैदान, क्रॉस मैदान और वांखेड़े स्टेडियम जैसे प्रतिष्ठित स्थलों के भविष्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

पार्टी ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मांग की है कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता रखी जाए और जनता को स्पष्ट जानकारी दी जाए कि जमीन का चयन कैसे होगा और कमर्शियल उपयोग से मिलने वाला पैसा कहां जाएगा।

साथ ही चेतावनी दी गई है कि अगर इस नीति को वापस नहीं लिया गया, तो खिलाड़ी, नागरिक और सामाजिक संगठन मैदानों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

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