अयातुल्ला खामेनेई के निधन के बाद मोजतबा खामेनेई बने नए सुप्रीम लीडर

Madhya Bharat Desk
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ईरान की राजनीति में एक ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील मोड़ आ गया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए संयुक्त हवाई हमले के बाद ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई। इस घटना ने न केवल तेहरान की सत्ता के केंद्र को हिला दिया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में तनाव को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है।

खामेनेई के निधन के बाद देश में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया। इस शून्य को भरने के लिए ईरान की 88 सदस्यीय संवैधानिक संस्था ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ ने आपात बैठक बुलाई। बंद कमरे में हुई गुप्त मतदान प्रक्रिया के बाद मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया ‘सुप्रीम लीडर’ चुना गया।

 कैसे हुआ चयन?

खामेनेई के निधन के तुरंत बाद देश की सर्वोच्च धार्मिक-राजनीतिक संस्था ने तेजी से कार्रवाई की। माना जा रहा है कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पहले से ही आंतरिक स्तर पर तैयार थी।

विश्लेषकों के अनुसार, मोजतबा खामेनेई लंबे समय से पर्दे के पीछे रहकर प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। उनके संबंध Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) से बेहद मजबूत बताए जाते हैं। यही कारण है कि उनके चयन में सुरक्षा प्रतिष्ठान की भूमिका अहम मानी जा रही है।

 कौन हैं मोजतबा खामेनेई?

मोजतबा खामेनेई, दिवंगत नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के दूसरे बेटे हैं। उन्होंने कभी औपचारिक रूप से कोई बड़ा सार्वजनिक पद नहीं संभाला, लेकिन वे अपने पिता के कार्यालय ‘बेत-ए-खामेनेई’ में खुफिया और सुरक्षा मामलों को संभालते रहे।

उन्हें एक सख्त और कट्टर विचारधारा वाला नेता माना जाता है, जो सैन्य और सुरक्षा ढांचे पर मजबूत पकड़ रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी छवि कठोर रुख अपनाने वाले रणनीतिकार की रही है।

 विरासत या बदलाव?

ईरान के इस्लामी गणराज्य के इतिहास में यह पहला मौका है जब सत्ता का हस्तांतरण पिता से पुत्र को हुआ है। इस घटनाक्रम को कई विशेषज्ञ देश की राजनीतिक संरचना में बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक भावना से ज्यादा शक्ति-संतुलन और संस्थागत प्रभाव का परिणाम है। वहीं समर्थक इसे स्थिरता बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बता रहे हैं।

 आगे क्या?

  • मोजतबा खामेनेई के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं—
  • अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते टकराव को संभालना
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच अर्थव्यवस्था को स्थिर रखना
  • देश के भीतर संभावित विरोध और असंतोष को शांत करना

फिलहाल ईरान में 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई है। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और क्षेत्रीय हालात पर दुनिया की नजर टिकी हुई है।

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