भोपाल से सामने आए एक गंभीर मामले ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और भ्रष्टाचार विरोधी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इस साल जनवरी से अब तक मध्य प्रदेश लोकायुक्त द्वारा पेश की गई 35 खात्मा रिपोर्ट को कोर्ट ने खारिज कर दिया है और सभी मामलों में दोबारा जांच के आदेश दिए हैं।
कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि इन मामलों की जांच अधूरी, कमजोर और लापरवाही से की गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 34 मामले छात्रवृत्ति घोटाले से जुड़े हैं—ऐसे मामले जिनका सीधा संबंध गरीब और जरूरतमंद छात्रों के भविष्य से है।
इन मामलों में शिकायत थी कि छात्रों के नाम पर मिलने वाली आर्थिक सहायता में बड़े स्तर पर गड़बड़ी हुई, लेकिन इसके बावजूद लोकायुक्त ने बिना पर्याप्त सबूत जुटाए ही फाइलें बंद करने की कोशिश की। कोर्ट ने इसे गंभीर चूक मानते हुए सभी रिपोर्ट को खारिज कर दिया।
कोर्ट की टिप्पणी बेहद कड़ी रही। न्यायालय ने कहा कि जांच के दौरान जरूरी दस्तावेज, गवाहों के बयान और ठोस प्रमाण तक इकट्ठा नहीं किए गए। इससे साफ होता है कि जांच को गंभीरता से लिया ही नहीं गया।
इस पूरे मामले पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि सिस्टम की नीयत पर सवाल है। कमलनाथ के मुताबिक, जब भ्रष्टाचार के इतने बड़े मामलों में जांच एजेंसी ही कमजोर रिपोर्ट पेश करे, तो यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं दोषियों को बचाने की कोशिश हो रही है।
उन्होंने आगे कहा कि यह मामला उन हजारों छात्रों के साथ अन्याय है, जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं लेकिन उनका पैसा बीच में ही गायब हो जाता है।
सरकार भले ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के दावे करती रही हो, लेकिन इस घटना ने उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब लोकायुक्त जैसी संस्था की जांच पर ही कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था की जवाबदेही बन जाती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस मामले में जिम्मेदारी तय करेगी या फिर इसे भी समय के साथ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। अगर सरकार वाकई भ्रष्टाचार के खिलाफ है, तो उसे निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी होगी, दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करनी होगी और भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।



