नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर कंटेंट हटाने को लेकर केंद्र सरकार की हालिया कार्रवाइयों पर बहस तेज हो गई है। इसी बीच प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने 1 अप्रैल 2026 को जारी अपने बयान में इन कदमों पर गहरी चिंता जताई है। क्लब का कहना है कि सरकार का यह रवैया मनमाना नजर आता है और इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ रहा है।
प्रेस क्लब के मुताबिक, हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां सरकार की आलोचना करने वाले कंटेंट को हटाने के लिए टेकडाउन आदेश जारी किए गए। इससे न केवल पोस्ट डिलीट किए गए बल्कि कई क्रिएटर्स के अकाउंट भी ब्लॉक कर दिए गए। क्लब ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन बताया है।
अपने बयान में क्लब ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए कहा कि अदालत पहले ही ऑनलाइन सेंसरशिप के अस्पष्ट और मनमाने प्रावधानों को खारिज कर चुकी है। ऐसे में मौजूदा कार्रवाई उस फैसले की भावना के विपरीत प्रतीत होती है।
क्लब ने यह भी आरोप लगाया कि हाल में कई स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को निशाना बनाया गया है। इनमें मोहम्मद ज़ुबैर के अलावा Molitics, National Dastak और 4PM News जैसे नाम शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इनसे जुड़े कंटेंट को फेसबुक और X जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ब्लॉक या हटाया गया।
इसके साथ ही क्लब ने मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MeitY) की भूमिका पर भी सवाल उठाए। क्लब का कहना है कि आईटी एक्ट की धारा 69A के तहत जारी किए जाने वाले आदेशों में पारदर्शिता की कमी है, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किस आधार पर कंटेंट हटाया गया।
प्रेस क्लब की मैनेजिंग कमेटी ने इन कार्रवाइयों को “कार्यपालिका का अतिरेक” करार देते हुए सरकार से अपील की है कि वह पत्रकारों और आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे। साथ ही, कंटेंट हटाने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब देशभर में सोशल मीडिया सेंसरशिप और डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर लगातार बहस तेज होती जा रही है।



