भारत में पानी का संकट अब सिर्फ एक पर्यावरणीय समस्या नहीं रहा, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। हाल ही में यूनाइटेड नेशन्स यूनिवर्सिटी की “ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी” रिपोर्ट ने इस खतरे को और गंभीर रूप में सामने रखा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जल संसाधनों की कमी भविष्य में समाजों और देशों के बीच टकराव का कारण बन सकती है। जल विशेषज्ञ कावेह मदानी का मानना है कि अगर अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में पानी को लेकर संघर्ष तेज हो सकता है।
भारत में सूखे की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। खासकर गंगा के मैदानी इलाकों और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में इसका असर ज्यादा देखने को मिल रहा है। कमजोर मानसून, बढ़ते तापमान और भूजल के लगातार दोहन ने हालात को और जटिल बना दिया है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि देश के कई हिस्सों—पश्चिमी, मध्य, हिमालयी, गंगा मैदानी, प्रायद्वीपीय और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों—में सूखे की तीव्रता बढ़ी है। जलवायु में अस्थिरता के कारण नमी तेजी से घट रही है और मौसम के पैटर्न असामान्य होते जा रहे हैं।
एक हालिया अध्ययन, जो क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित हुआ, उसमें पाया गया कि गंगा के मैदानी क्षेत्र और उत्तर-पूर्व भारत में सूखे की स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर है। वहीं PNAS में छपे एक अन्य शोध के अनुसार, 1991 से 2020 के बीच गंगा बेसिन ने पिछले 1300 सालों का सबसे भीषण सूखा झेला है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा खतरा
जल संकट अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है। यह देश की आंतरिक स्थिरता और सुरक्षा पर भी असर डाल सकता है। पानी की कमी से सामाजिक तनाव और आर्थिक असंतुलन बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
कृषि में बदलाव ही समाधान
भारत में करीब 85% पानी का उपयोग कृषि में होता है। ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि सुधार की शुरुआत यहीं से करनी होगी।
ड्रिप सिंचाई, सोलर पंप, कम पानी में उगने वाली फसलें और मिट्टी की नमी बचाने के तरीके अपनाने होंगे। साथ ही भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए सख्त नीतियां जरूरी हैं।
दुनिया से सीखने की जरूरत
सूखे से निपटने के लिए दुनिया के कुछ उदाहरण भारत के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
इजरायल ने समुद्री पानी को मीठा बनाने (डीसैलिनेशन) और पानी के पुनः उपयोग से अपनी स्थिति मजबूत की है।
वहीं कैलिफोर्निया और ऑस्ट्रेलिया ने मजबूत जल प्रबंधन और विविध अर्थव्यवस्था के जरिए सूखे के बावजूद खुद को संभाले रखा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट का हल सिर्फ तकनीक से नहीं निकलेगा। इसके लिए स्थानीय ज्ञान, मजबूत नीतियां और आर्थिक विविधता का संतुलित मेल जरूरी है।
अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में पानी की कमी भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकती है।



