छत्तीसगढ़ में इन दिनों ‘सुशासन’ की नई परिभाषा लिखी जा रही है — खेतों में धान नहीं, बल्कि अफीम लहलहा रही है। ताजा मामला रायगढ़ जिले के तमनार थाना क्षेत्र के आमाघाट का है, जहां अफीम की खेती पकड़ी गई है। लेकिन सवाल यह है कि ये खेती खेतों में हो रही थी या सिस्टम की छांव में?
बीते कुछ दिनों में दुर्ग के पाटन से लेकर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में 4 से 5 जगहों पर अफीम की खेती का खुलासा हो चुका है। इतनी तेजी से हो रहे इन खुलासों ने यह तो साफ कर दिया है कि यह कोई छोटी-मोटी ‘गलती’ नहीं, बल्कि एक संगठित खेल है और खेल भी ऐसा, जो बिना संरक्षण के संभव नहीं।
प्रदेश में विष्णुदेव साय सरकार को सत्ता में आए करीब दो साल हो चुके हैं। लेकिन सुशासन का दावा अब सवालों के कटघरे में खड़ा है। क्योंकि जब-जब अफीम के खेत पकड़े जा रहे हैं, तब-तब यह भी सामने आ रहा है कि इसमें जुड़े चेहरे सत्ता के आसपास ही मंडरा रहे हैं।
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अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सब बिना ‘ऊपर’ की जानकारी के हो सकता है?
या फिर यह मान लिया जाए कि सिस्टम अब इतना ‘लचीला’ हो चुका है कि अवैध खेती भी आराम से फल-फूल सकती है?
राज्य का सूचना तंत्र भी इस पूरे मामले में ‘गहरी नींद’ में नजर आ रहा है। आखिर इतने बड़े स्तर पर हो रही अवैध खेती की भनक किसी को क्यों नहीं लगी? या फिर यह मान लिया जाए कि सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गई थीं?
सबसे दिलचस्प बात है मुख्यमंत्री और गृह विभाग की चुप्पी। यह चुप्पी अब सवालों से ज्यादा जवाब देने लगी है। क्योंकि राजनीति में अक्सर कहा जाता है
“खामोशी भी बहुत कुछ कहती है…”
अब देखना यह है कि यह अफीम का खेल सिर्फ खेतों तक सीमित रहता है, या इसकी जड़ें सत्ता के गलियारों तक भी पहुंचती हैं।







