विवादों के घेरे में कुलपति पटेरिया: राज्यपाल की मुलाकात के बाद बढ़ी अटकलें, क्या बचेगी कुर्सी?

Madhya Bharat Desk
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शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया एक बार फिर सुर्खियों में हैं। करोड़ों रुपये की उत्तरपुस्तिकाओं की प्रस्तावित खरीदी को लेकर उठे सवालों के बीच उनकी कुलाधिपति से हुई हालिया मुलाकात ने विश्वविद्यालय और राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

सूत्र बताते हैं कि प्रो. पटेरिया गुरुवार शाम अचानक रायगढ़ से रायपुर पहुंचे और कुलाधिपति से मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब उनके नियमित कार्यकाल की अवधि 24 नवंबर 2025 को पूरी हो चुकी है। ऐसे में बड़े वित्तीय फैसलों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 उत्तरपुस्तिका खरीदी पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

जानकारों का कहना है कि पाँच वर्षों के लिए बड़ी मात्रा में उत्तरपुस्तिकाएं खरीदने का निर्णय कई दृष्टिकोण से विचारणीय है।

विशेषज्ञों का तर्क है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद परीक्षा प्रणाली और प्रश्नपत्रों के स्वरूप में बदलाव आया है। ऐसे में दीर्घकालिक स्तर पर भारी मात्रा में उत्तरपुस्तिकाएं खरीदना क्या व्यावहारिक होगा?

इसके अलावा विश्वविद्यालय परिसर में इतने बड़े भंडारण की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। क्या सुरक्षित स्टोरेज की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है?

प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों में, जहां कुलपतियों का कार्यकाल जारी है, वहां इस तरह की लंबी अवधि की खरीदी का कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया है। इस कारण यह निर्णय अलग और असामान्य माना जा रहा है।

 संघ की नाराजगी की चर्चा, लेकिन पुष्टि नहीं

विश्वविद्यालय के अंदरूनी सूत्रों और राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि संघ से जुड़े कुछ नेता प्रो. पटेरिया की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

लेकिन कुलाधिपति से हुई अचानक मुलाकात ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है। सवाल यह भी है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी उनका पद पर बने रहना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है या किसी बड़े निर्णय की भूमिका तैयार हो रही है?

 पांच साल का कार्यकाल: उपलब्धियों पर बहस

विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद अपेक्षित शैक्षणिक और प्रशासनिक सुधारों को लेकर भी समय-समय पर आवाजें उठती रही हैं। आलोचकों का कहना है कि पांच वर्षों में कोई बड़ी उपलब्धि दर्ज नहीं हो सकी।

हालांकि प्रो. पटेरिया ने कई बार यह तर्क दिया कि उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों और सीमित सहयोग का सामना करना पड़ा। उनका कार्यकाल मुख्यतः पूर्ववर्ती सरकार के दौरान बीता, जिसे वे कई निर्णयों में बाधा मानते रहे हैं।

 अब आगे क्या?

कुलाधिपति से हुई मुलाकात के बाद क्या कोई प्रशासनिक स्पष्टता सामने आएगी?

क्या उत्तरपुस्तिका खरीदी का निर्णय जारी रहेगा या उस पर पुनर्विचार होगा?

फिलहाल विश्वविद्यालय परिवार, छात्र संगठन और राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें आने वाले दिनों पर टिकी हैं। आने वाला समय ही तय करेगा कि प्रो. पटेरिया की कुर्सी सुरक्षित रहती है या कोई बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिलता है।

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