मध्य प्रदेश में विकास के दावों के बीच एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। भोपाल-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग-45 पर बना 400 करोड़ रुपये की लागत वाला ओवरब्रिज महज तीन साल में ही ढह गया। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विधायक कमलनाथ ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। यह हादसा सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
बताया जा रहा है कि पुल का करीब 200 मीटर हिस्सा अचानक गिर गया। विडंबना यह है कि जिस हिस्से में पिछले छह महीनों से मरम्मत कार्य चल रहा था, वही भाग धराशायी हुआ। इससे साफ संकेत मिलता है कि संरचना में पहले से ही तकनीकी कमजोरी मौजूद थी। इसके बावजूद यातायात चालू रखा गया, जो प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि घटनास्थल से लगभग 50 मीटर की दूरी पर रेलवे ट्रैक गुजरता है। यदि मलबा सीधे पटरियों पर गिरता या उसी समय कोई ट्रेन गुजर रही होती, तो बड़ा हादसा हो सकता था। सौभाग्य से जनहानि की खबर नहीं है, लेकिन संभावित खतरा बेहद बड़ा था।
इस मामले पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमलनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि तीन साल में पुल का गिर जाना “गंभीर भ्रष्टाचार या घोर लापरवाही” की ओर संकेत करता है। कमलनाथ ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
यह ओवरब्रिज भोपाल और जबलपुर जैसे दो प्रमुख शहरों को जोड़ने वाले मार्ग पर स्थित है। इसके क्षतिग्रस्त होने से न केवल यातायात प्रभावित होगा, बल्कि व्यापारिक गतिविधियों और आम लोगों की दैनिक दिनचर्या पर भी असर पड़ेगा।
अब सवाल यह है कि 400 करोड़ रुपये की परियोजना में गुणवत्ता मानकों का पालन कैसे हुआ? निर्माण एजेंसी कौन थी? निगरानी किसके जिम्मे थी? और जब मरम्मत जारी थी, तब सुरक्षा मानकों को क्यों नजरअंदाज किया गया?
जनता जानना चाहती है कि क्या इस मामले में जवाबदेही तय होगी या यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में सिमट कर रह जाएगा।
यह घटना केवल एक पुल का ढहना नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा है। यदि बुनियादी ढांचे की उम्र तीन साल भी न हो, तो विकास के दावों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।



