केंद्र सरकार ने बजट पेश करते हुए एक बार फिर “सबका साथ, सबका विकास” का दावा दोहराया। ढोल-नगाड़ों के साथ उपलब्धियों की सूची गिनाई गई, लेकिन बजट दस्तावेज़ों और भाषणों को खंगालने पर एक सवाल उभरकर सामने आया—क्या वाकई सब शामिल हैं?
बजट सत्र के दौरान सरकार से तीखा सवाल पूछा गया कि योजनाओं और घोषणाओं की सूची में सवर्ण, जनरल कैटेगरी और EWS जैसे शब्द क्यों नदारद हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश बजट में इन वर्गों का नाम तक न लिया जाना कई सामाजिक समूहों को खटक रहा है। आलोचकों का आरोप है कि यह केवल शब्दों की कमी नहीं, बल्कि एक सोच का संकेत है।
सरकार ने विभिन्न वर्गों के लिए योजनाएँ, अनुदान, मुफ्त सुविधाएँ और सम्मान की घोषणाएँ कीं, लेकिन जनरल/EWS वर्ग बजट के बाद भी यही सोचता दिखा—“क्या हमारा नाम किसी योजना में था?”
यह वही वर्ग है जो बड़ी संख्या में GST, इनकम टैक्स और अप्रत्यक्ष करों के ज़रिये सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा देता है, लेकिन नीति निर्धारण के समय उसे अक्सर अदृश्य मान लिया जाता है।
विश्लेषकों का कहना है कि जब कोई सरकार अपने बजट में किसी वर्ग का नाम लेने से भी हिचकती है, तो यह स्वाभाविक है कि उस वर्ग में असंतोष पनपे। सवाल सीधा है—जो सरकार पहचान से कतराए, उसे भरोसा और समर्थन कैसे मिले?
सरकार का बजट आया,
ढोल-नगाड़ा खूब बजाया।
कहा – सबका विकास होगा,
पर जेब देखी… फिर वही धोखा पाया।
किसी को योजना, किसी को अनुदान,
किसी को मुफ्त में सम्मान,
और जनरल/EWS खड़ा सोचता रहा –
“भाई, हमारा नाम भी था क्या प्लान?”
“सबका साथ” का नारा तभी सार्थक माना जाएगा, जब बजट और नीतियों में भी सबकी मौजूदगी साफ़ दिखे। वरना यह नारा काग़ज़ों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा



