कांग्रेस पार्टी के भीतर जारी असंतोष की आग एक बार फिर धधक उठी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने राहुल गांधी की नेतृत्व शैली पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें एक ‘असुरक्षित’ (Insecure) और ‘डरपोक’ नेता करार दिया है। उनके इस विस्फोटक बयान ने सियासी गलियारों में खलबली मचा दी है।
“मजबूत नेताओं से कतराते हैं राहुल”
शकील अहमद ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी उन नेताओं को पसंद नहीं करते जिनकी अपनी स्वतंत्र सोच है या जिनकी जमीन पर मजबूत पकड़ है। उन्होंने कहा:
असहजता: जो नेता संगठन में अपना प्रभाव रखते हैं, वे राहुल गांधी को असहज करते हैं।
कद छोटा करना: पार्टी में जानबूझकर ऐसे कद्दावर नेताओं को कमजोर किया गया है ताकि किसी का भी व्यक्तित्व नेतृत्व से बड़ा न दिखे।
नेतृत्व का अभाव: जमीनी स्तर के नेताओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा, जिससे पार्टी का ढांचा खोखला हो रहा है।
आंतरिक लोकतंत्र पर प्रहार
अहमद ने केवल व्यक्ति विशेष पर ही नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के भीतर लोकतांत्रिक संवाद खत्म हो चुका है और फैसले केवल एक छोटे से बंद कमरे के दायरे तक सीमित रह गए हैं। इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है।
राजनितिक विश्लेषकों का कहना है कि जब पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र और संवाद की कमी हो, तो वह देश के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ी नहीं हो सकती।
पुरानी बीमारी या नया संकट?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शकील अहमद का यह बयान उस लंबे समय से चले आ रहे असंतोष का हिस्सा है, जिसके कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और गुलाम नबी आजाद जैसे कई दिग्गज पार्टी छोड़ चुके हैं। यह बयान दर्शाता है कि ‘G-23’ के दौर से शुरू हुई खींचतान अभी थमी नहीं है।
अब तक की स्थिति
नेतृत्व की चुप्पी: कांग्रेस आलाकमान की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है।
विपक्ष को मिला मुद्दा: बीजेपी और अन्य विरोधी दल इस बयान को कांग्रेस की “टूटती दीवार” के रूप में पेश कर रहे हैं।






