रायपुर।नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य के शुरुआती वर्षों में जहां प्रदेश में केवल दो शासकीय विश्वविद्यालय संचालित होते थे, वहीं आज एक केंद्रीय विश्वविद्यालय सहित राज्य में 15 से अधिक विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ चुके हैं। संख्या के इस विस्तार के बावजूद शिक्षा जगत से जुड़े निष्पक्ष विश्लेषकों का मानना है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता और नेतृत्व स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। हालात ऐसे हैं कि आज प्रदेश में उच्च शैक्षणिक दृष्टि और प्रशासनिक क्षमता वाले कुलपति खोजना मुश्किल हो गया है।
कुलपतियों की नियुक्ति के लिए बनाई गई तथाकथित ‘सर्च कमेटियों’ के बावजूद चयन प्रक्रिया पर राजनीतिक प्रभाव हावी बताया जा रहा है। योग्यता और अकादमिक योगदान के बजाय राजनीतिक पहुंच को प्राथमिकता दिए जाने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। इसी क्रम में इन दिनों शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ के कुलपति डॉ. ललित प्रकाश पटेरिया को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।
गौरतलब है कि यह विश्वविद्यालय कांग्रेस शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में स्थापित हुआ था। वर्ष 2020 में प्रो. ललित प्रकाश पटेरिया को इस विश्वविद्यालय का प्रथम कुलपति नियुक्त किया गया था। उस समय वे गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत थे। उनका कार्यकाल पांच वर्षों का था, जो 24 नवंबर 2025 को समाप्त हो चुका है।
इसके बावजूद भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार अब तक उन्हें पद से मुक्त नहीं कर पाई है और वे अब भी कुलपति के रूप में कार्यरत हैं। इसे लेकर सत्ता परिवर्तन के बावजूद प्रशासनिक निर्णय न ले पाने का आरोप राज्य सरकार पर लग रहा है।
प्रदेश के शासकीय विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति को लेकर एक और बड़ा सवाल स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवारों का है। हाल के दिनों में खैरागढ़ विश्वविद्यालय और बिलासपुर ओपन विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश से आए शिक्षाविदों को कुलपति नियुक्त किया गया है। वहीं यह भी चर्चा है कि जम्मू विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को छत्तीसगढ़ में कुलपति बनाए जाने का आश्वासन दिया गया है।
कहा जा रहा है कि अन्य राज्यों से आए ये शिक्षाविद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इतनी मजबूत पकड़ रखते हैं कि उनकी अनदेखी करने पर मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर राजभवन तक दबाव की स्थिति बन सकती है। इसके चलते छत्तीसगढ़ के स्थानीय शिक्षाविद खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आवेदन से लेकर पैनल तक में नाम होने के बावजूद अंतिम नियुक्ति किसी अन्य राज्य के व्यक्ति की हो रही है।
तुलना करें तो पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में विश्वविद्यालयों की संख्या छत्तीसगढ़ से अधिक है, लेकिन वहां एक भी विश्वविद्यालय में बाहरी राज्य का कुलपति नियुक्त नहीं किया गया है। वहां लंबे समय से यह परंपरा रही है कि प्रदेश में अध्यापन कार्य कर रहे शिक्षकों को ही नेतृत्व का अवसर दिया जाए।
इस बीच प्रदेश में तीन और विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है। इनमें से दो में प्रक्रिया जारी है, जबकि शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ की चयन प्रक्रिया दो महीने पहले ही पूरी हो चुकी है। बावजूद इसके नए कुलपति की नियुक्ति को जानबूझकर टाल दिया गया है। माना जा रहा है कि भूपेश बघेल के कार्यकाल में नियुक्त किए गए कुलपति को हटाने में भाजपा सरकार असहज महसूस कर रही है।
डॉ. पटेरिया इससे पहले भी उस समय चर्चा में आए थे, जब तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने बिलासपुर स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में अपने भाषण के दौरान उनका उल्लेख किया था। उस दौरान यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि उन्हें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), नई दिल्ली का कुलपति बनाया जा सकता है। हालांकि राजनीतिक समीकरण बदले और जुलाई 2025 में धनखड़ के इस्तीफे के बाद IGNOU में नए कुलपति की नियुक्ति हो गई, जिससे डॉ. पटेरिया इस अवसर से चूक गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय के सर्वांगीण विकास के लिए कुलपति का स्थानीय परिस्थितियों, शैक्षणिक जरूरतों और सामाजिक संरचना से परिचित होना बेहद जरूरी है। हाल ही में विधानसभा में भाजपा के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने भी इसी मुद्दे को उठाया था। उन्होंने सवाल किया था कि जब प्रदेश में प्रतिभा की कमी नहीं है तो बाहरी लोगों पर निर्भरता क्यों?
उन्होंने ‘मेड इन छत्तीसगढ़’ की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा था कि जब दुर्गा पंडाल सजाने से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक में दूसरे राज्यों पर निर्भरता बनी रहेगी, तो 2047 के विकसित भारत का सपना केवल कल्पना बनकर रह जाएगा।







