भारत की वायु रक्षा क्षमता को बड़ी मजबूती देते हुए नई पीढ़ी की सतह से हवा में मार करने वाली आकाश-NG (Next Generation) मिसाइल प्रणाली ने अपने सभी उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। इसके साथ ही भारतीय सेना और वायुसेना में इसकी तैनाती का रास्ता साफ हो गया है।
ध्वनि की गति से लगभग ढाई गुना तेज उड़ान भरने वाली इस अत्याधुनिक मिसाइल की मारक क्षमता करीब 60 किलोमीटर है। आकाश-NG को विशेष रूप से उत्तर और पश्चिमी सीमाओं पर उभरते आधुनिक हवाई खतरों से निपटने के लिए विकसित किया गया है। यह मिसाइल दुश्मन के स्टील्थ फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल और ड्रोन जैसे कम राडार क्रॉस सेक्शन वाले लक्ष्यों को भी सटीकता से नष्ट करने में सक्षम है।
2026 में होगी सेनाओं में तैनाती
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, परीक्षणों के दौरान आकाश-NG ने कम ऊंचाई, लंबी दूरी और अधिक ऊंचाई की विभिन्न परिस्थितियों में हवाई लक्ष्यों को बेहद सटीकता से भेदा। इन परीक्षणों में डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ भारतीय वायुसेना के अधिकारी भी मौजूद रहे।
डीआरडीओ प्रमुख समीर वी. कामत ने कहा कि इन सफल परीक्षणों ने आकाश-NG को सशस्त्र बलों में शामिल किए जाने की दिशा में बड़ा कदम साबित किया है। सूत्रों की मानें तो 2026 तक यह प्रणाली वायुसेना में शामिल हो सकती है।
अन्य रक्षा प्रणालियों से होगी आसान कनेक्टिविटी
लगभग 96 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री से बनी यह मिसाइल प्रणाली भारत की विदेशी हथियारों पर निर्भरता को काफी हद तक कम करेगी। आकाश-NG को आधुनिक कमान और नियंत्रण नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है, जिससे यह अन्य एयर डिफेंस सिस्टम के साथ समन्वय में काम कर सकेगी। इससे किसी भी संभावित हवाई हमले का त्वरित और प्रभावी जवाब देना आसान होगा।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (रि.) अरूप राहा ने कहा कि आधुनिक युद्धों में मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि हाल के सैन्य अभियानों में मजबूत वायु रक्षा के कारण दुश्मन नुकसान नहीं पहुंचा सका।
वहीं रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल (रि.) जी.डी. बख्शी ने कहा कि आकाश-NG जैसी क्विक रिएक्शन मिसाइल से भारत की वायु रक्षा प्रणाली लगभग लीक-प्रूफ कवच में बदल जाएगी। इससे दुश्मन की 90 प्रतिशत से अधिक मिसाइलों को हवा में ही नष्ट किया जा सकेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रणाली अमेरिका, रूस और यूरोप की समान श्रेणी की मिसाइल प्रणालियों की तुलना में काफी किफायती है।







