भारत में बाल यौन शोषण के मामलों में न्याय की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम सामने आया है। पहली बार ऐसा हुआ है जब एक वर्ष में दर्ज हुए पॉक्सो (POCSO) मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया गया। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रन (C-LAB) की रिपोर्ट “पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन” के अनुसार, वर्ष 2025 में देशभर में पॉक्सो अधिनियम के तहत 80,320 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का न्यायिक निपटारा किया गया। इस तरह देश की औसत निपटान दर 109 प्रतिशत दर्ज की गई।
इस उपलब्धि में छत्तीसगढ़ ने सबसे प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए देश में पहला स्थान हासिल किया है। राज्य में वर्ष 2025 के दौरान पॉक्सो कानून के अंतर्गत 1,416 मामले दर्ज हुए, जबकि अदालतों द्वारा 2,678 मामलों का निपटारा किया गया। इससे राज्य की निपटान दर 189 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ की अदालतों ने न केवल नए मामलों का तेज़ी से निपटारा किया, बल्कि वर्षों से लंबित मामलों को भी बड़ी संख्या में समाप्त किया।
रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि भारत की न्याय व्यवस्था अब केवल लंबित मामलों को संभालने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से कम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वर्ष 2023 तक देश में पॉक्सो से जुड़े लगभग 2.62 लाख मामले लंबित थे, लेकिन वर्तमान रुझान बताते हैं कि यह संख्या अब धीरे-धीरे घट रही है।
C-LAB की रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह गति बनी रहती है, तो अगले चार वर्षों में लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह समाप्त करने के लिए देशभर में लगभग 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की आवश्यकता होगी। इसके लिए करीब 1,977 करोड़ रुपये के बजट का अनुमान लगाया गया है, जिसमें निर्भया फंड के उपयोग की सिफारिश की गई है।
इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक पुरुजीत प्रहराज ने कहा कि यह उपलब्धि सिर्फ आंकड़ों की जीत नहीं है, बल्कि बच्चों के न्याय तंत्र पर दोबारा भरोसा कायम होने का संकेत है। उन्होंने कहा कि न्याय में हर दिन की देरी बच्चे के मानसिक और भावनात्मक आघात को और गहरा करती है, इसलिए मामलों का त्वरित निपटारा प्रशासनिक के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी भी है।
रिपोर्ट में यह सुझाव भी दिया गया है कि लंबित मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को और तेज़ करने के लिए राज्यों को तकनीकी संसाधनों का बेहतर उपयोग करना चाहिए। एआई आधारित कानूनी उपकरण, डिजिटल केस मैनेजमेंट और ई-कोर्ट सिस्टम के विस्तार से हर पीड़ित बच्चे तक समय पर न्याय पहुंचाया जा सकता है।







