धिरौली, मध्यप्रदेश। सिंगरौली के धिरौली इलाके में मोदानी कंपनी द्वारा कोयला खदान के लिए की जा रही कथित अवैध पेड़ों की कटाई ने एक बार फिर आदिवासी क्षेत्रों में कॉर्पोरेट प्रभाव और सरकारी मौन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस कंपनी को विकास का अग्रदूत बताया जाता है, उसी पर अब लोगों की आस्था, जंगल और अस्तित्व पर “विनाश का ठेका” लेने के आरोप लग रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कंपनी ने बिना स्टेज-II फॉरेस्ट क्लियरेंस और ग्राम सभा की मंजूरी के जंगलों को साफ करना शुरू कर दिया है। यह कदम न सिर्फ पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि पाँचवीं अनुसूची, PESA और FRA जैसे संवैधानिक प्रावधानों को पूरी तरह नजरअंदाज करता है—जहाँ आदिवासी स्वशासन सर्वोच्च माना गया है।
इस क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी और PVTG समुदाय अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के साथ-साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को लेकर भी चिंतित हैं। महुआ, तेंदू, जड़ी-बूटियाँ और ईंधन जैसे जंगल आधारित संसाधन उनके जीवन का आधार हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यहाँ सिर्फ पेड़ नहीं काटे जा रहे, बल्कि “एक पूरी सभ्यता को उखाड़ने की साज़िश” चल रही है।
मोदानी कंपनी पर पहले से विस्थापित परिवारों को दोबारा हटाने का आरोप भी लगा है। यह दोहरा आघात स्थानीय लोगों के बीच रोष का बड़ा कारण बना हुआ है।
वहीं, सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं—क्योंकि पूरा प्रशासन इस कार्रवाई के दौरान चुपचाप खड़ा दिख रहा है।
इसी बीच मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार 800 पुलिसकर्मियों की सुरक्षा व्यवस्था को पीछे छोड़ते हुए जंगल में पहुँच गए और स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया।
दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने गृह मंत्री मोहन यादव पर तंज कसते हुए कहा, “अगर 400 पुलिसवाले 12 नेताओं को नहीं रोक पा रहे, तो फिर यह कैसा गृह मंत्रालय चल रहा है?”
यह मामला अब सिर्फ एक खदान की लड़ाई नहीं रहा—यह जनजातीय अधिकार बनाम कॉर्पोरेट दबाव का प्रतीक बन चुका है। सवाल यह भी है कि क्या संविधान केवल भाषणों तक सीमित रह गया है, जबकि ज़मीन पर उसकी आत्मा को लगातार रौंदा जा रहा है?



