छत्तीसगढ़ में नई शराब नीति को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। सरकार ने आगामी वित्तीय वर्ष 2026–27 के लिए शराब नीति को पारदर्शी और व्यवहारिक बनाने की दिशा में काम शुरू किया है। इसी को लेकर तीन दिनों तक रायपुर में बैठकों का दौर चला। इन बैठकों में लाइसेंसधारकों, शराब उद्योग से जुड़े लोगों, विदेशी कंपनियों और क्लब संचालकों से सुझाव लिए गए। सरकार का कहना है कि इन सुझावों के आधार पर नई नीति को इस तरह बनाया जाएगा कि कोई अव्यवस्था न फैले और शराब बिक्री के नियमों का सख्ती से पालन हो सके।
दूसरी ओर, Indian National Congress ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सरकार आम जनता से सुझाव लेने की बजाय शराब माफिया और कारोबारी वर्ग से सलाह ले रही है। पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि जब प्रदेश की महिलाएं शराबबंदी की मांग को लेकर लगातार आंदोलन कर रही हैं, तब सरकार उनकी आवाज़ को अनदेखा कर रही है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि नीति बनाने में उन महिलाओं से राय क्यों नहीं ली जा रही जिनके घर अवैध शराब की वजह से तबाह हो रहे हैं।
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने सत्ता में आने से पहले शराबबंदी का वादा किया था, लेकिन अब शराब बिक्री बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। पार्टी का कहना है कि नीति बनाते समय जनता की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
वहीं Bharatiya Janata Party ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज कर दिया है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि विभाग का उद्देश्य सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि क्लबों और बारों में तय समय और नियमों के अनुसार काम हो, ताकि पहले जैसी अव्यवस्था न हो। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
इस मुद्दे ने राज्य में शराब नीति को लेकर सियासत को और तेज कर दिया है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता और व्यवस्था की बात कर रही है, वहीं विपक्ष इसे जनभावनाओं के खिलाफ बता रहा है। अब सबकी नज़र इस बात पर है कि सरकार अंतिम नीति बनाते समय जनता की बात को कितना महत्व देती है।



