राजधानी रायपुर में स्थित ऐतिहासिक कर्बला तालाब के पास चल रहे अवैध निर्माण कार्य को लेकर पर्यावरण प्रेमियों में गहरी नाराज़गी है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय डॉ. Rakesh Gupta ने इस मामले पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने प्रदेश के वन मंत्री को एक विस्तृत पत्र भेजकर तुरंत कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह निर्माण कार्य न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की भी सीधी अवमानना है।
डॉ. गुप्ता ने आरोप लगाया है कि Chhattisgarh Wetland Authority ने 30 सितंबर 2025 को ही स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि किसी भी तालाब के 50 मीटर के भीतर कोई भी पक्का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद कर्बला तालाब के पास तेजी से सीमेंट की दीवारें, रिटेनिंग वॉल और कंक्रीट के खंभे खड़े किए जा रहे हैं। यह सब वेटलैंड (प्रबंधन एवं संरक्षण) नियम, 2017 का खुला उल्लंघन है।
उन्होंने बताया कि नगर निगम और जिला प्रशासन की अनदेखी में यह निर्माण कार्य हो रहा है। 13 अक्टूबर 2025 को ली गई तस्वीरों में तालाब से कुछ ही मीटर की दूरी पर नई सीमेंट की दीवारें साफ़ दिखाई दे रही हैं। इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और पर्यावरण संरक्षण को लेकर उसकी प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वेटलैंड नियम, 2017 के अनुसार किसी भी तालाब या जलाशय के उच्च बाढ़ स्तर (हाई फ्लड लेवल) से 50 मीटर की दूरी के भीतर किसी भी प्रकार का पक्का निर्माण पूरी तरह से प्रतिबंधित है। Supreme Court of India ने भी अपने आदेशों में जल स्रोतों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
डॉ. गुप्ता का कहना है कि यदि वेटलैंड प्राधिकरण के आदेशों की अनदेखी इसी प्रकार जारी रही तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार की पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता केवल कागज़ों तक सीमित है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि यह प्रशासनिक अनुशासन पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रही है।
यह मामला तालाबों और जल स्रोतों के संरक्षण की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे निर्माण न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाते हैं बल्कि आने वाले समय में जल संकट को और भी गहरा सकते हैं। डॉ. राकेश गुप्ता ने मांग की है कि प्रशासन तत्काल इस अवैध निर्माण को रोके और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोई भी संस्था या व्यक्ति पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी करने का साहस न कर सके।



