रायपुर। छत्तीसगढ़ में हाल ही में पारित भू-अधिकार संशोधन विधेयक 2025 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह कानून किसानों और आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन पर सीधा हमला है।
पहले व्यवस्था थी कि जब भी किसी भूमि का नामांतरण (नाम बदलना) होता था, तो उसका नोटिस स्थानीय अखबारों में प्रकाशित होता था। इस प्रक्रिया से गाँव, समाज और रिश्तेदारों को जानकारी मिल जाती थी और अगर कहीं धोखाधड़ी, दबाव या जबरन कब्ज़े जैसी स्थिति होती, तो वे आपत्ति दर्ज कर सकते थे। यह व्यवस्था किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच थी।

लेकिन नए संशोधन में यह प्रावधान हटा दिया गया है। अब न तो अखबार में नोटिस प्रकाशित होगा और न ही कोई सार्वजनिक घोषणा होगी। ऐसे में यदि कोई धोखे से किसी की जमीन बेच देता है, तो असली मालिक को इसकी जानकारी भी नहीं मिलेगी। जब तक भूमि स्वामी को पता चलेगा, तब तक उसकी जमीन किसी और के नाम दर्ज हो चुकी होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भू-माफियाओं और पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाला है, जबकि किसानों और आदिवासियों की सुरक्षा को खत्म करता है। ग्रामीण इलाकों में इसे लेकर गहरी चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि भाजपा सरकार विकास के नाम पर असल में आदिवासियों और किसानों की ज़मीन बड़े उद्योगपतियों के हाथों सौंपने की साजिश कर रही है।
लोगों का आह्वान है कि अब चुप बैठने का समय नहीं है। अपनी ज़मीन और हक बचाने के लिए आवाज़ उठाना ही सबसे बड़ा हथियार है।







