अडानी को दी उपजाऊ ज़मीन, बंजर कह कर उजाड़ा भविष्य

Madhya Bharat Desk
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भागलपुर (बिहार)।बिहार के भागलपुर जिले के पीरपैंती में किसानों की उपजाऊ ज़मीन पर चल रहा विवाद अब राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। अडानी पावर लिमिटेड को यहां करीब 1,020 से 1,050 एकड़ उपजाऊ ज़मीन महज़ ₹1 प्रति एकड़ प्रति वर्ष की दर से 25 से 33 साल की लंबी लीज़ पर दी गई है। इस फैसले ने किसानों और ग्रामीणों के बीच गुस्से की आग भड़का दी है। ग्रामीणों का कहना है कि यह सौदा उनकी पीढ़ियों की मेहनत और जीवन के साथ किया गया सबसे बड़ा धोखा है।

हज़ारों पेड़ों का कत्लेआम, बगीचों को दिखाया ‘बंजर’
यह वही ज़मीन है जहां हज़ारों की संख्या में आम, लीची और सागवान जैसे पेड़ लगे थे। यहां के बागान न केवल किसानों की आजीविका का आधार थे, बल्कि यह पूरा इलाका फलों के उत्पादन के लिए मशहूर था। लेकिन पावर प्लांट के नाम पर इन सभी पेड़ों की बलि दी जा रही है। किसानों का कहना है कि ज़मीन का आकलन करते वक्त अधिकारियों ने जानबूझकर बगीचों और उपजाऊ खेतों को “बंजर” घोषित कर दिया, ताकि उनकी असली कीमत न देनी पड़े।

मुआवज़े में घोटाले की परतें
मुआवज़े के नाम पर किसानों को केवल निराशा और ठगी मिली। ग्रामीणों का आरोप है कि करीब ₹200 से ₹300 करोड़ का घोटाला हुआ है। ज़मीन के मुआवज़े का असमान वितरण इस घोटाले का सबसे बड़ा सबूत है। एक ही परिवार की एक ही ज़मीन पर दो भाइयों को अलग-अलग मुआवज़ा दिया गया — किसी को करोड़ों, तो किसी को लाखों। किसानों का कहना है कि यह सब बिना बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार किए संभव ही नहीं था।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस खेल में सृजन नामक एनजीओ को माध्यम बनाया गया और जिला प्रशासन, भू-अर्जन विभाग व अन्य कर्मचारियों की मिलीभगत से पैसे की बंदरबांट की गई। यहां तक कि कई अधिकारियों के खिलाफ़ जांच हुई और कुछ जेल भी गए, लेकिन अभी तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।

रोजगार के वादे झूठे निकले
सरकार और कंपनी ने किसानों को रोजगार देने का वादा किया था। कहा गया था कि पावर प्लांट बनने से स्थानीय लोगों को रोज़गार और विकास मिलेगा। लेकिन RTI से खुलासा हुआ कि कंपनी या सरकार की ओर से रोजगार की कोई गारंटी नहीं है। किसानों का कहना है कि रोजगार के नाम पर उन्हें केवल सपने दिखाए गए, हकीकत में कुछ भी नहीं मिला।

किसानों का दोहरा शोषण
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ज़मीन छिन जाने के बाद भी किसानों को अपनी ज़मीन की लगान/जमाबंदी खुद चुकानी पड़ रही है। यानि ज़मीन पर हक अब न सरकार का है, न किसान का, लेकिन टैक्स फिर भी किसानों से वसूला जा रहा है। यह किसानों के लिए दोहरा बोझ बन गया है।

गांवों की बदहाली जस की तस
पावर प्लांट के नाम पर विकास का जो सपना दिखाया गया था, वह केवल कागज़ों में रह गया। पहाड़िया टोली जैसी आदिवासी बस्तियों से लेकर आसपास के गांवों तक, ज्यादातर पुरुष रोज़गार की तलाश में दिल्ली, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में पलायन कर गए हैं। गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी नहीं हैं। महिलाएं कहती हैं कि बच्चों को आंगनबाड़ी की सुविधा पूरी नहीं मिलती, स्कूल दूर हैं और आवास योजनाएं केवल घोषणा बनकर रह गई हैं।

अफसरशाही और कॉरपोरेट की मिलीभगत
ग्रामीणों ने साफ कहा कि पावर प्लांट का असली खेल “₹1 वाली लीज़” नहीं बल्कि कमीशन और घोटाले का है। अधिकारियों ने किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा करके मुआवज़े को अपने लिए कमाई का साधन बना लिया। रिश्वत, मोलभाव और दलाली खुलेआम हुई। यह पूरा खेल वर्षों से चल रहा है और 2014 से ही किसानों की ज़मीन अफसरशाही और कॉरपोरेट की मिलीभगत का शिकार होती रही है।

किसानों के सवाल, सरकार की चुप्पी
किसानों का कहना है कि जब नई भूमि अधिग्रहण नीति में ग्रामीण क्षेत्र की ज़मीन का चार गुना मुआवज़ा तय था, तो उन्हें वह क्यों नहीं मिला? पेड़ों और बागानों की कीमत क्यों नहीं जोड़ी गई? और रोजगार व विकास के नाम पर दिखाए गए सपनों की जिम्मेदारी कौन लेगा? इन सवालों का जवाब न तो सरकार दे रही है और न ही कंपनी।

पीरपैंती के किसान कहते हैं कि यह लड़ाई केवल अडानी या मोदी की नहीं है, बल्कि उस अदने किसान की है जिसकी ज़मीन और हक अफसरशाही और कॉरपोरेट की जेब में समा गए।

अगर किसानों की उपजाऊ ज़मीन ₹1 में अडानी को मिल सकती है, तो क्या किसानों की मेहनत, पसीना और खून की कीमत भी अफसरों और कॉरपोरेट के सौदे पर लिखी जाएगी? पावर प्लांट गांव में रोशनी देगा या नहीं, यह बाद की बात है। अभी तो पूरा सिस्टम ही अंधेरे में डूबा हुआ है।

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