बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे की भूमिका को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की जनसुराज यात्रा और उनकी सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों ने इस चर्चा को नई दिशा दी है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से जनता एनडीए और महागठबंधन से अलग एक नए विकल्प की तलाश कर रही है। चुनावी आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। पिछले चार विधानसभा चुनावों में लगातार 25% से ज्यादा वोटरों ने ऐसे दलों को चुना, जो न तो एनडीए का हिस्सा थे और न ही महागठबंधन का।
इसी राजनीतिक खालीपन को भरने की कोशिश में प्रशांत किशोर का जनसुराज अभियान आगे बढ़ रहा है। अब देखने वाली बात होगी कि यह जनसमर्थन वोटों में बदलकर सत्ता संतुलन को किस हद तक प्रभावित कर पाता है।
बिहार की सियासत में अब तक एनडीए और महागठबंधन की पकड़ मजबूत रही है, लेकिन बदलते हालात और आंकड़े बताते हैं कि तीसरे मोर्चे की जमीन राज्य में लगातार मजबूत हो रही है।



