राहुल गांधी के राजनीतिक को सीधे-सीधे कांशीराम की इस रणनीति से जोड़ना थोड़ा जटिल है, क्योंकि उनकी पृष्ठभूमि और लक्ष्य अलग हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में उनकी कार्यशैली में कुछ ऐसे बदलाव देखे गए हैं, जो कांशीराम की रणनीति से मेल खाते हैं।
जन-केंद्रित रणनीति: 2014 और 2019 के चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद, राहुल गांधी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के माध्यम से सीधे जनता से जुड़ने की कोशिश की, जैसा कि कांशीराम ने अपने शुरुआती दिनों में बामसेफ और डीएस-4 जैसे संगठनों के जरिए किया था। दोनों नेताओं का उद्देश्य जमीनी स्तर पर जाकर जनता की समस्याओं को समझना और उन्हें संगठित करना था।
सामाजिक न्याय का एजेंडा: राहुल गांधी ने ‘जितनी आबादी, उतना हक’ और जातीय जनगणना जैसे मुद्दे उठाकर सामाजिक न्याय के विमर्श को नई दिशा दी। यह कांशीराम के ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ के नारे से काफी मिलता-जुलता है। राहुल गांधी ने भी वंचितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर जोर दिया है, जो कांशीराम की बहुजन राजनीति का मूल आधार था।
चुनावी हार के बाद संगठन पर ध्यान: कांशीराम ने शुरुआती हार को संगठन को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा। इसी तरह, 2019 की हार के बाद, राहुल गांधी ने तत्काल जीत पर ध्यान देने के बजाय, भारत जोड़ो यात्राओं के माध्यम से पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश की। 2024 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन, विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, इस बदली हुई रणनीति का परिणाम माना जा सकता है।
प्रमुख अंतर
पृष्ठभूमि और नेतृत्व: कांशीराम ने एक पूरी तरह से नए सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत की थी, जबकि राहुल गांधी एक स्थापित राजनीतिक परिवार और पार्टी से आते हैं। कांशीराम का संघर्ष शून्य से शुरू हुआ था, जबकि राहुल गांधी को एक विरासत मिली है।
उद्देश्य: कांशीराम का मुख्य उद्देश्य दलितों और बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से सशक्त करना था, जबकि राहुल गांधी का उद्देश्य कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करना और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में स्थापित करना है।
रणनीति का चरण: कांशीराम ने अपनी रणनीति के हर चरण को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया था, जबकि राहुल गांधी की रणनीति में यह क्रम उतना स्पष्ट नहीं है। उनके राजनीतिक करियर में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, जिनमें उनकी रणनीतियां भी समय-समय पर बदलती रही हैं।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि भले ही राहुल गांधी कांशीराम के ‘पहला हारने, दूसरा हरवाने, तीसरा जीतने’ वाले नारे का सीधे तौर पर पालन न कर रहे हों, लेकिन उनकी हाल की राजनीति में सामाजिक मोबिलाइज़ेशन और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की जो कोशिशें दिख रही हैं, वे कांशीराम की मूल भावना से काफी मिलती-जुलती हैं।



