छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चों के लिए बने सरकारी हॉस्टलों में स्टील के जग की खरीद पर बड़ा घोटाला सामने आया है। एक जग की कीमत ₹32,500 बताई गई है, जबकि मार्केट में यही सामान ₹300-₹500 तक मिल जाता है। कुल 160 जग खरीदने में 52 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। यह मामला राज्य की भाजपा सरकार पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
राज्य की भाजपा सरकार ने आदिवासी बच्चों के कल्याण के नाम पर जिस तरह से “स्टील के जग” खरीदे हैं, वह न सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि यह आदिवासी बच्चों के हक पर खुली डकैती के समान है।

- एक जग की कीमत: ₹32,500
- कुल खरीदे गए जग: 160
- कुल खर्च: ₹52 लाख
जबकि बाजार में वही स्टील जग ₹300-₹500 में आराम से उपलब्ध हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर इतना भारी-भरकम भुगतान क्यों और किसके फायदे के लिए किया गया?

जमीनी सच्चाई:
जहां एक तरफ आदिवासी बच्चे सरकारी हॉस्टलों में दो वक़्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके नाम पर करोड़ों की खरीददारी कर सरकार के भीतर दलालों का नेटवर्क सक्रिय दिखाई दे रहा है।
विपक्ष का आरोप:
विपक्ष का कहना है कि
“बीजेपी ने बच्चों के भविष्य के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि उनका पैसा लूटकर नेताओं का भविष्य सुरक्षित कर लिया है।”
“ये सरकार नहीं, दलालों का सिंडिकेट है — हर नल, हर जग, हर योजना में कमीशनखोरी की बू आ रही है।”
इस खुलासे के बाद जनता और सामाजिक संगठनों में भारी रोष है। लोगों की मांग है कि इस घोटाले की उच्चस्तरीय जांच हो और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
यह मामला सिर्फ एक खरीद घोटाले का नहीं है, बल्कि यह सरकार की प्राथमिकताओं और भ्रष्टाचार के प्रति उसकी सहनशीलता पर सीधा सवाल है। आदिवासी बच्चों के नाम पर लूट की यह दास्तान कहीं न कहीं यह साबित करती है कि विकास के दावों की चकाचौंध में असल ज़रूरतमंद अब भी पीछे छूट रहे हैं।







