महाराष्ट चुनाव से पहले तक चुनाव आयोग के इर्द गिर्द जो शंका भरे सवाल सिसकियों और कानाफूसी तक सिमटे थे वो अब सड़क पर संघर्ष में तब्दील हो चुके हैं. बिहार चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण के सवाल पर चुनाव आयोग मौन मुद्रा में पहुंच गया है.
यहां सवाल सिर्फ चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर ही नहीं है. सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र संस्थानों की साख का है, जिसे चुनाव आयोग ने सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है.
चुनाव आयोग को ये बताना चाहिए कि आखिर महाराष्ट्र चुनाव के दौरान वोटर लिस्ट में हुई कथित धांधली के आरोप पर वो विपक्ष को अब तक विश्वास में क्यों नहीं ले पाया?
क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को बिहार की स्थिति के विषय में कोई जानकारी नहीं है? आखिर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सभी कंफ्यूजन पर पूर्ण विराम क्यों नहीं लगा रहे हैं?
जिस “आधार कार्ड” के आधार पर चुनाव आयोग लोगों को वोटर लिस्ट बांटती है वो आधार कार्ड आखिर वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण में शामिल क्यों नहीं किया गया है? जब तमाम आंकड़े चीख-चीख कर ये बता रहे हैं कि बिहार की ग्रामीण आबादी उन 11 दस्तावेजों को देने में असमर्थ है जो चुनाव आयोग मांग रही है तो फिर इस पर बात कौन करेगा?
पहला वोटर लिस्ट का ड्राफ्ट 1 अगस्त को आना है. 1 अगस्त से 1 सितंबर तक वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने का आवेदन देने की मोहलत होगी. 1 सितंबर से 25 सितंबर तक तमाम दावों और अपीलों पर सुनवाई के बाद 30 सितंबर को फाइनल वोटर लिस्ट आना है. अब सवाल है कि क्या महज 1 महीने में 2 करोड़ 93 लाख लोगों के लिए वोटर लिस्ट में स्क्रुटनी संभव है? वोटर लिस्ट में सुधार और अपील की सुविधा कितनी सुगम और सरल बनाने के लिए चुनाव आयोग ने क्या तैयारी की है?
चुनाव आयोग सवाल और संविधान से बड़ा नहीं हो सकता. मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी जनता का उतना ही हस्तक्षेप संभव है जितना कि किसी प्रधानमंत्री पर. क्या इस देश के मुख्य चुनाव आयुक्त राहुल गांधी और तेजस्वी यादव को अपना प्रतिद्वंदी मान बैठे हैं? अगर नहीं तो फिर देश के प्रधानमंत्री की तरह मीडिया से दूर क्यों बैठे हैं?
महाराष्ट्र चुनाव के बाद राहुल गांधी ने बिहार में फिर से चुनाव आयोग को चोर कहा है. सरकार का चोर.
चुनाव आयोग को समझना होगा कि बिहार भाषा के विवाद में उलझने वाला महाराष्ट्र नहीं है. यहां बात सीधी और स्पष्ट होती है फिर चाहे जिस भाषा में हो. कल 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनाव आयोग के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई है. तब तक गहन चिंतन की बात तो ये है कि आखिर इस देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सभी विषयों पर साफगोई से बात करने को कौन रोक रहा है







