सार
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। पटना के गांधी मैदान में “वक्फ सुरक्षा सम्मेलन” के तहत बड़ी रैली आयोजित की गई, जिसमें इमारत-ए-शरिया के नेतृत्व में हजारों लोगों ने भाग लिया।
विस्तार
राज्य में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है और ऐसे में यह मुद्दा विपक्ष के लिए बेहद अहम हो गया है। इमारत-ए-शरिया — जो बिहार, झारखंड, ओडिशा और बंगाल में मुस्लिम समुदाय की प्रभावशाली संस्था मानी जाती है — ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संस्था का कहना है कि नया वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 धार्मिक अधिकारों का हनन है।
संस्था की मुख्य आपत्तियां इस प्रकार हैं:
- ‘वक्फ बाय यूज’ की धारा हटाई गई है, जिससे वर्षों से उपयोग में ली जा रही भूमि अब पंजीकरण के बिना वक्फ नहीं मानी जाएगी।
- गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने का प्रावधान।
- जिलाधिकारी को यह अधिकार देना कि वह वक्फ संपत्ति को सरकारी घोषित कर सके।
- सीमा अधिनियम (Limitation Act) को लागू कर वक्फ बोर्ड के दावों को समय सीमा में सीमित करना।
बिहार क्यों बना केंद्र बिंदु?
बिहार में लगभग 17% मुस्लिम आबादी है, और इमारत-ए-शरिया की गहरी पैठ यहां देखी जाती है। पूर्व नेता मौलाना वली रहमानी के कार्यकाल से यह संगठन लगातार सक्रिय रहा है। आने वाले चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस जैसी पार्टियां इस मुद्दे को हथियार बनाकर भाजपा पर दबाव बना रही हैं। तेजस्वी यादव इस रैली में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए।
संस्था ने ऐलान किया है कि वह इस विरोध को जिला स्तर तक ले जाएगी और दिल्ली में एक राष्ट्रीय स्तर की रैली भी आयोजित करेगी।
केंद्र सरकार की स्थिति:
अप्रैल में सरकार ने यह संकेत दिया था कि विवादित प्रावधान जैसे ‘वक्फ बाय यूज’ और गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने की प्रक्रिया पर रोक लग सकती है, लेकिन अब तक कोई औपचारिक संशोधन अधिसूचित नहीं हुआ है। इससे असमंजस और आंदोलन की स्थिति बनी हुई है।






