नई दिल्ली/कोलकाता। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बुधवार को पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी। लेकिन चुनाव की घोषणा के साथ ही पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद सामने आ गया है।
दरअसल, राज्य की वोटर लिस्ट अभी पूरी तरह अंतिम रूप में तैयार नहीं हो पाई है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक लगभग 60 लाख से ज्यादा मतदाताओं के आवेदन अभी “न्यायिक जांच” के दायरे में हैं। इन आवेदनों की जांच विभिन्न न्यायिक अधिकारियों द्वारा की जा रही है और इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कलकत्ता हाई कोर्ट कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार इन मतदाताओं के नामों को फिलहाल “तार्किक विसंगति” (Logical Discrepancy) के आधार पर अस्थायी रूप से मतदाता सूची से अलग रखा गया है। हालांकि, भारतीय निर्वाचन आयोग ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन लाखों लोगों की जांच कब तक पूरी होगी और उनका मतदाता दर्जा कब तय होगा।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान कराने की घोषणा की है। पहला चरण 23 अप्रैल और दूसरा चरण 29 अप्रैल को प्रस्तावित है। मतदान की तारीखें भले ही अप्रैल के अंतिम सप्ताह में रखी गई हैं, लेकिन इससे पहले इन लाखों लोगों के मताधिकार पर स्थिति साफ होना अभी बाकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर 23 अप्रैल से पहले यह न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो उन मतदाताओं के अधिकारों को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल उठ सकते हैं।
चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि यदि एक भी वैध मतदाता तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि के कारण सूची से बाहर रह जाता है, तो पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर सवाल खड़े हो सकते हैं।
ऐसे में पश्चिम बंगाल का आगामी चुनाव केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि संवैधानिक और प्रशासनिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य में चुनाव पूर्ण और अंतिम मतदाता सूची के आधार पर होंगे, या फिर इस मुद्दे पर नई राजनीतिक बहस छिड़ेगी।







